Couplets Poetry (page 114)

सारी दुनिया के मसाइल यूँ मुझे दरपेश हैं

शहरयार

सफ़र का नश्शा चढ़ा है तो क्यूँ उतर जाए

शहरयार

सभी को ग़म है समुंदर के ख़ुश्क होने का

शहरयार

रात को दिन से मिलाने की हवस थी हम को

शहरयार

पिछले सफ़र में जो कुछ बीता बीत गया यारो लेकिन

शहरयार

पल भर में कैसे लोग बदल जाते हैं यहाँ

शहरयार

पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात

शहरयार

नज़राना तेरे हुस्न को क्या दें कि अपने पास

शहरयार

नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता

शहरयार

नहीं है मुझ से तअ'ल्लुक़ कोई तो ऐसा क्यूँ

शहरयार

न ख़ुश-गुमान हो इस पर तू ऐ दिल-ए-सादा

शहरयार

मुझ को ले डूबा तिरा शहर में यकता होना

शहरयार

मिरे सूरज आ! मिरे जिस्म पे अपना साया कर

शहरयार

मैं सोचता हूँ मगर याद कुछ नहीं आता

शहरयार

मैं अकेला सही मगर कब तक

शहरयार

लोग सर फोड़ कर भी देख चुके

शहरयार

क्यूँ आज उस का ज़िक्र मुझे ख़ुश न कर सका

शहरयार

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में

शहरयार

कोई नया मकीन नहीं आया तो हैरत क्या

शहरयार

कितनी तब्दील हुइ किस लिए तब्दील हुइ

शहरयार

किस किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया

शहरयार

ख़जिल चराग़ों से अहल-ए-वफ़ा को होना है

शहरयार

कौन सी बात है जो उस में नहीं

शहरयार

कहने को तो हर बात कही तेरे मुक़ाबिल

शहरयार

कहिए तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ

शहरयार

कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें

शहरयार

काग़ज़ की कश्तियाँ भी बहुत काम आएँगी

शहरयार

जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने

शहरयार

जो होने वाला है अब उस की फ़िक्र क्या कीजे

शहरयार

जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा

शहरयार