Couplets Poetry (page 112)
चाहे अब आप भी मुझे आसेब ही कहें
शहज़ाद अहमद
बुझ गई शम्अ कटी रात गई सब महफ़िल
शहज़ाद अहमद
बिगड़ी हुई इस शहर की हालत भी बहुत है
शहज़ाद अहमद
भूल कर भी कोई लेता नहीं अब नाम-ए-वफ़ा
शहज़ाद अहमद
भरपूर नहीं हैं किसी चेहरे के ख़द-ओ-ख़ाल
शहज़ाद अहमद
बे-हुनर हाथ चमकने लगा सूरज की तरह
शहज़ाद अहमद
बस यही होगा कि दीवाना कहेंगे अहल-ए-बज़्म
शहज़ाद अहमद
बस एक लम्हे में क्या कुछ गुज़र गई दिल पर
शहज़ाद अहमद
बैठा ही रहा सुब्ह से में धूप ढले तक
शहज़ाद अहमद
बहुत शर्मिंदा हूँ इबलीस से मैं
शहज़ाद अहमद
अपने लिए तो ख़ाक की ख़ुश्बू है ज़िंदगी
शहज़ाद अहमद
अपने ही अक्स को पानी में कहाँ तक देखूँ
शहज़ाद अहमद
अजनबी शहरों में तुझ को ढूँढता हूँ जिस तरह
शहज़ाद अहमद
अजब नहीं कि इसी बात पर लड़ाई हो
शहज़ाद अहमद
ऐ सुब्ह की किरन मुझे प्यारी है तू बहुत
शहज़ाद अहमद
अगर दो दिल कहीं भी मिल गए हैं
शहज़ाद अहमद
अब तो साफ़ सुनता हूँ अपने दिल की हर धड़कन
शहज़ाद अहमद
अब तो इंसान की अज़्मत भी कोई चीज़ नहीं
शहज़ाद अहमद
अब मिरा दर्द मरी जान हुआ जाता है
शहज़ाद अहमद
अब जहाँ मैं हूँ वहाँ मेरे सिवा कुछ भी नहीं
शहज़ाद अहमद
अब भी वही दिन रात हैं लेकिन फ़र्क़ ये है
शहज़ाद अहमद
अब अपने चेहरे पर दो पत्थर से सजाए फिरता हूँ
शहज़ाद अहमद
आज़ाद था मिज़ाज तो क्यूँ घर बना लिया
शहज़ाद अहमद
आता है ख़ौफ़ आँख झपकते हुए मुझे
शहज़ाद अहमद
आरज़ूओं ने कई फूल चुने थे लेकिन
शहज़ाद अहमद
आरज़ू की बे-हिसी का गर यही आलम रहा
शहज़ाद अहमद
आँखें न खुलें नूर के सैलाब में मेरी
शहज़ाद अहमद
आँख उठा के मेरी सम्त अहल-ए-नज़र न देख पाए
शहज़ाद अहमद
आज तक उस की मोहब्बत का नशा तारी है
शहज़ाद अहमद
आगे निकल गए वो मुझे देखते हुए
शहज़ाद अहमद