Couplets Poetry (page 113)
ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो थी नहीं कुछ कम है
शहरयार
ज़ख़्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से
शहरयार
ज़बाँ मिली भी तो किस वक़्त बे-ज़बानों को
शहरयार
ये क़ाफ़िले यादों के कहीं खो गए होते
शहरयार
ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है
शहरयार
ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता
शहरयार
ये जब है कि इक ख़्वाब से रिश्ता है हमारा
शहरयार
ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है
शहरयार
या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है
शहरयार
या मैं सोचूँ कुछ भी न उस के बारे में
शहरयार
वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे
शहरयार
वक़्त को क्यूँ भला बुरा कहिए
शहरयार
उस को किसी के वास्ते बे-ताब देखते
शहरयार
उम्र-सफ़र जारी है बस ये खेल देखने को
शहरयार
उम्र का लम्बा हिस्सा कर के दानाई के नाम
शहरयार
उम्र का बाक़ी सफ़र करना है इस शर्त के साथ
शहरयार
उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए
शहरयार
तुझ से मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी
शहरयार
तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें
शहरयार
तुझे भूल गया कभी याद नहीं करता तुझ को
शहरयार
तू कहाँ है तुझ से इक निस्बत थी मेरी ज़ात को
शहरयार
तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा
शहरयार
तिरा ख़याल भी तेरी तरह सितमगर है
शहरयार
तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
शहरयार
सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
शहरयार
सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
शहरयार
शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है
शहरयार
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
शहरयार
शहर-ए-उम्मीद हक़ीक़त में नहीं बन सकता
शहरयार
शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को
शहरयार