Couplets Poetry (page 111)
हौसला है तो सफ़ीनों के अलम लहराओ
शहज़ाद अहमद
हर तरफ़ फैली हुई थी रौशनी ही रौशनी
शहज़ाद अहमद
हर दम तिरी शबीह थी आँखों के सामने
शहज़ाद अहमद
हमारे शहर में है वो गुरेज़ का आलम
शहज़ाद अहमद
हमारे पेश-ए-नज़र मंज़िलें कुछ और भी थीं
शहज़ाद अहमद
हैराँ हूँ हासिदों को पता कैसे चल गया
शहज़ाद अहमद
गुज़रने ही न दी वो रात मैं ने
शहज़ाद अहमद
गुज़र ही जाएगी 'शहज़ाद' जो गुज़रनी है
शहज़ाद अहमद
गोशा-ए-दिल की ख़मोशी का तमन्नाई मैं
शहज़ाद अहमद
घबरा के आसमाँ की तरफ़ देखती थी ख़ल्क़
शहज़ाद अहमद
फ़लक से घूरती हैं मुझ को बे-शुमार आँखें
शहज़ाद अहमद
एक से मंज़र देख देख कर आँखें दुखने लगती हैं
शहज़ाद अहमद
एक लम्हे में कटा है मुद्दतों का फ़ासला
शहज़ाद अहमद
इक आग फिर भड़क उट्ठी है दीदा ओ दिल में
शहज़ाद अहमद
दूर से देख के मैं ने उसे पहचान लिया
शहज़ाद अहमद
दुनिया में अंधेरों के सिवा और रहा क्या
शहज़ाद अहमद
डूब जाता है दमकता हुआ सूरज लेकिन
शहज़ाद अहमद
दीवार किस तरफ़ से बढ़े कुछ ख़बर नहीं
शहज़ाद अहमद
दिन निकलते ही वो ख़्वाबों के जज़ीरे क्या हुए
शहज़ाद अहमद
दिल सा वहशी कभी क़ाबू में न आया यारो
शहज़ाद अहमद
दिल पे ऐ दोस्त क़यामत सी गुज़र जाती है
शहज़ाद अहमद
दिल पर भी आओ एक नज़र डालते चलें
शहज़ाद अहमद
दिल ओ निगाह का ये फ़ासला भी क्यूँ रह जाए
शहज़ाद अहमद
दिल भी तो इक दयार है रौशन हरा-भरा
शहज़ाद अहमद
दश्त में कैसी दीवारें
शहज़ाद अहमद
दस बजे रात को सो जाते हैं ख़बरें सुन कर
शहज़ाद अहमद
चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की
शहज़ाद अहमद
छुप छुप के कहाँ तक तिरे दीदार मिलेंगे
शहज़ाद अहमद
छोड़ने मैं नहीं जाता उसे दरवाज़े तक
शहज़ाद अहमद
चाहता हूँ कि हो परवाज़ सितारों से बुलंद
शहज़ाद अहमद