Couplets Poetry (page 109)
नक़्श-ए-हैरत बन गई दुनिया सितारों की तरह
शहज़ाद अहमद
न सही कुछ मगर इतना तो किया करते थे
शहज़ाद अहमद
न सही जिस्म मगर ख़ाक तो उड़ती फिरती
शहज़ाद अहमद
न मिले वो तो तलाश उस की भी रहती है मुझे
शहज़ाद अहमद
न मैं ने दस्त-शनासी का फिर किया दावा
शहज़ाद अहमद
मुसाफ़िर हो तो सुन लो राह में सहरा भी आता है
शहज़ाद अहमद
मुझे बस इतनी शिकायत है मरने वालों से
शहज़ाद अहमद
मेरी रुस्वाई में वो भी हैं बराबर के शरीक
शहज़ाद अहमद
मयस्सर फिर न होगा चिलचिलाती धूप में चलना
शहज़ाद अहमद
मतलूब है क्या अब यही कहते नहीं बनती
शहज़ाद अहमद
मंज़िल पे जा के ख़ाक उड़ाने से फ़ाएदा
शहज़ाद अहमद
मंज़िल है कठिन दिल बहुत आराम-तलब है
शहज़ाद अहमद
मैं तिरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता
शहज़ाद अहमद
मैं सुन रहा हूँ मगर दूसरों को कैसे सुनाऊँ
शहज़ाद अहमद
मैं गुल-ए-ख़ुश्क हूँ लम्हे में बिखर सकता हूँ
शहज़ाद अहमद
मैं चाहता हूँ हक़ीक़त-पसंद हो जाऊँ
शहज़ाद अहमद
मैं अपनी जाँ में उसे जज़्ब किस तरह करता
शहज़ाद अहमद
लोग ज़िंदा नज़र आते थे मगर थे मक़्तूल
शहज़ाद अहमद
लेते हैं लोग साँस भी अब एहतियात से
शहज़ाद अहमद
क्यूँ बुलाती है मुझे दुनिया उसी के नाम से
शहज़ाद अहमद
कुछ तेरे सबब थी मिरे पहलू में हरारत
शहज़ाद अहमद
कुछ तज़किरा-ए-हुस्न से रौशन थे दर-ओ-बाम
शहज़ाद अहमद
कुछ देखने की दिल में तमन्ना नहीं बाक़ी
शहज़ाद अहमद
कोई तो रात को देखेगा जवाँ होते हुए
शहज़ाद अहमद
कोई बताओ कि किस के लिए तलाश करें
शहज़ाद अहमद
किस लिए वो शहर की दीवार से सर फोड़ता
शहज़ाद अहमद
ख़्वाहिशों की धूल से चेहरे उभरते ही नहीं
शहज़ाद अहमद
ख़ुशा वो दर्द के लम्हे कि तेरे जाने पर
शहज़ाद अहमद
खुली फ़ज़ा में अगर लड़खड़ा के चल न सकें
शहज़ाद अहमद
खुले असरार उस पर जिस्म के आहिस्ता आहिस्ता
शहज़ाद अहमद