Couplets Poetry (page 110)

ख़ुद पर भी खोलिए न कभी दिल की वारदात

शहज़ाद अहमद

ख़ुद ही तस्वीर बनाता हूँ मिटा देता हूँ

शहज़ाद अहमद

ख़ामुशी ही में सही पर कभी इज़हार तो कर

शहज़ाद अहमद

ख़ल्क़ बे-परवा ख़ुदा बंदों से तंग आया हुआ

शहज़ाद अहमद

ख़बर नहीं कि ख़ला किस जगह पे हो मौजूद

शहज़ाद अहमद

करो बे-नूर महफ़िल-ए-इमरोज़

शहज़ाद अहमद

कम नहीं है ये अज़िय्यत कि अभी ज़िंदा हूँ

शहज़ाद अहमद

कल थी ये फ़िक्र उसे हाल सुनाएँ कैसे

शहज़ाद अहमद

कभी कभी छलक उठता है आब ओ रंग उन का

शहज़ाद अहमद

जुलते हैं इक चराग़ की लौ से कई चराग़

शहज़ाद अहमद

जो सामने था उस के ख़द-ओ-ख़ाल नहीं याद

शहज़ाद अहमद

जिस से दो रोज़ भी खुल कर न मुलाक़ात हुई

शहज़ाद अहमद

जिस को जाना ही नहीं उस को ख़ुदा क्यूँ मानें

शहज़ाद अहमद

जिस के बाइस अभी ठंडक है मिरे सीने में

शहज़ाद अहमद

झूटी बातें रहने दो

शहज़ाद अहमद

जवाज़ कोई अगर मेरी बंदगी का नहीं

शहज़ाद अहमद

जैसे मुँह-बंद कली रात के वीराने में

शहज़ाद अहमद

जहाँ में मंज़िल-ए-मक़्सूद ढूँडने वाले

शहज़ाद अहमद

जहाँ में हम ने किसी से भी खुल के बात न की

शहज़ाद अहमद

जब उस की ज़ुल्फ़ में पहला सफ़ेद बाल आया

शहज़ाद अहमद

जब चल पड़े तो बर्क़ की रफ़्तार से चले

शहज़ाद अहमद

इस राह से गुज़रे थे कभी अहल-ए-नज़र भी

शहज़ाद अहमद

इस क़दर तेज़ न चल साँस उखड़ जाएगा

शहज़ाद अहमद

इस आस पे सैलाब के सीने पे रवाँ हूँ

शहज़ाद अहमद

हुज़ूर-ए-हुस्न ये दिल कासा-ए-गदाई है

शहज़ाद अहमद

हुस्न बाज़ार की ज़ीनत है मगर है तो सही

शहज़ाद अहमद

हम जो दस्तक कभी देते थे सबा की मानिंद

शहज़ाद अहमद

हम दो क़दम भी चल न सके ख़ाक-ए-पा हुए

शहज़ाद अहमद

हम अपने हाल पर ख़ुद रो दिए हैं

शहज़ाद अहमद

हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब

शहज़ाद अहमद