Couplets Poetry (page 115)

जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा

शहरयार

जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा

शहरयार

जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है

शहरयार

जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है

शहरयार

जान-बूझ कर समझ कर मैं ने भुला दिया

शहरयार

इन दिनों मैं भी हूँ कुछ कार-ए-जहाँ में मसरूफ़

शहरयार

हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की

शहरयार

हम ख़ुश हैं हमें धूप विरासत में मिली है

शहरयार

हम जुदा हो गए आग़ाज़-ए-सफ़र से पहले

शहरयार

हर तरफ़ अपने को बिखरा पाओगे

शहरयार

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है

शहरयार

है कोई जो बताए शब के मुसाफ़िरों को

शहरयार

है आज ये गिला कि अकेला है 'शहरयार'

शहरयार

गुलाब टहनी से टूटा ज़मीन पर न गिरा

शहरयार

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है

शहरयार

ग़म की दौलत बड़ी मुश्किल से मिला करती है

शहरयार

गर्दिश-ए-वक़्त का कितना बड़ा एहसाँ है कि आज

शहरयार

इक सिर्फ़ हमीं मय को आँखों से पिलाते हैं

शहरयार

एक ही मिट्टी से हम दोनों बने हैं लेकिन

शहरयार

इक बूँद ज़हर के लिए फैला रहे हो हाथ

शहरयार

दिल रिझा है तुझ पे ऐसा बद-गुमाँ होगा नहीं

शहरयार

दिल परेशाँ हो मगर आँख में हैरानी न हो

शहरयार

देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है

शहरयार

चल चल के थक गया है कि मंज़िल नहीं कोई

शहरयार

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी

शहरयार

बे-नाम से इक ख़ौफ़ से दिल क्यूँ है परेशाँ

शहरयार

बताऊँ किस तरह अहबाब को आँखें जो ऐसी हैं

शहरयार

बहुत शोर था जब समाअ'त गई

शहरयार

अक्स-ए-याद-ए-यार को धुँदला किया है

शहरयार

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो

शहरयार