Couplets Poetry (page 120)

मत पूछ वारदात-ए-शब-ए-हिज्र ऐ 'नसीर'

शाह नसीर

मैं उस की चश्म का बीमार-ए-ना-तवाँ हूँ तबीब

शाह नसीर

मय-कशी का है ये शौक़ उस को कि आईने में

शाह नसीर

ले गया दे एक बोसा अक़्ल ओ दीन ओ दिल वो शोख़

शाह नसीर

लगाई किस बुत-ए-मय-नोश ने है ताक उस पर

शाह नसीर

लगा न दिल को तू अपने किसी से देख 'नसीर'

शाह नसीर

लगा जब अक्स-ए-अबरू देखने दिलदार पानी में

शाह नसीर

लब-ए-दरिया पे देख आ कर तमाशा आज होली का

शाह नसीर

क्यूँ मय के पीने से करूँ इंकार नासेहा

शाह नसीर

क्या दिखाता है फ़लक-ए-गर्म तू नान-ए-ख़ुर्शीद

शाह नसीर

कोई ये शैख़ से पूछे कि बंद कर आँखें

शाह नसीर

की है उस्ताद-ए-अज़ल ने ये रुबाई मौज़ूँ

शाह नसीर

की है उस्ताद-ए-अज़ल ने ये रुबाई मौज़ूँ

शाह नसीर

ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दूता में 'नसीर' पीटा कर

शाह नसीर

ख़याल-ए-नाफ़-ए-बुताँ से हो क्यूँ कि दिल जाँ-बर

शाह नसीर

कम नहीं है अफ़सर-शाही से कुछ ताज-ए-गदा

शाह नसीर

काबे से ग़रज़ उस को न बुत-ख़ाने से मतलब

शाह नसीर

जूँ मौज हाथ मारिए क्या बहर-ए-इश्क़ में

शाह नसीर

जा-ब-जा दश्त में ख़ेमे हैं बगूले के खड़े

शाह नसीर

जब कि ले ज़ुल्फ़ तिरी मुसहफ़-ए-रुख़ का बोसा

शाह नसीर

इसी मज़मून से मालूम उस की सर्द-मेहरी है

शाह नसीर

इश्क़ ही दोनों तरफ़ जल्वा-ए-दिलदार हुआ

शाह नसीर

हम वो फ़लक हैं अहल-ए-तवक्कुल कि मिस्ल-ए-माह

शाह नसीर

हम हैं और मजनूँ अज़ल से ख़ाना-पर्वर्द-ए-जुनूँ

शाह नसीर

हम दिखाएँगे तमाशा तुझ को फिर सर्व-ए-चमन

शाह नसीर

हो गुफ़्तुगू हमारी और अब उस की क्यूँकि आह

शाह नसीर

हवा पर है ये बुनियाद-ए-मुसाफ़िर ख़ाना-ए-हस्ती

शाह नसीर

ग़ुरूर-ए-हुस्न न कर जज़्बा-ए-ज़ुलेख़ा देख

शाह नसीर

ग़ज़ल इस बहर में क्या तुम ने लिखी है ये 'नसीर'

शाह नसीर

ग़रज़ न फ़ुर्क़त में कुफ़्र से थी न काम इस्लाम से रहा था

शाह नसीर