Couplets Poetry (page 121)
गर्दिश-ए-चर्ख़ नहीं कम भी हंडोले से कि महर
शाह नसीर
गले में तू ने वहाँ मोतियों का पहना हार
शाह नसीर
इक पल में झड़ी अब्र-ए-तुनक-माया की शेख़ी
शाह नसीर
इक आबला था सो भी गया ख़ार-ए-ग़म से फट
शाह नसीर
दूद-ए-आह-ए-जिगरी काम न आया यारो
शाह नसीर
दिन रात यहाँ पुतलियों का नाच रहे है
शाह नसीर
दिल-ए-पुर-आबला लाया हूँ दिखाने तुम को
शाह नसीर
दिला उस की काकुल से रख जम्अ ख़ातिर
शाह नसीर
देखोगे कि मैं कैसा फिर शोर मचाता हूँ
शाह नसीर
देख तू यार-ए-बादा-कश मैं ने भी काम क्या किया
शाह नसीर
दे मुझ को भी इस दौर में साक़ी सिपर-ए-जाम
शाह नसीर
दैर-ओ-काबा में तफ़ावुत ख़ल्क़ के नज़दीक है
शाह नसीर
चमन में ग़ुंचा मुँह खोले है जब कुछ दिल की कहने को
शाह नसीर
चमन में देखते ही पड़ गई कुछ ओस ग़ुंचों पर
शाह नसीर
बुर्क़ा को उलट मुझ से जो करता है वो बातें
शाह नसीर
बोसा-ए-ख़ाल-ए-लब-ए-जानाँ की कैफ़िय्यत न पूछ
शाह नसीर
बसान-ए-आइना हम ने तो चश्म वा कर ली
शाह नसीर
बना कर मन को मनका और रग-ए-तन के तईं रिश्ता
शाह नसीर
बजाए आब मय-ए-नर्गिसी पिला मुझ को
शाह नसीर
ब'अद-ए-मजनूँ क्यूँ न हूँ मैं कार-फ़रमा-ए-जुनूँ
शाह नसीर
ऐ ख़ाल-ए-रुख़-ए-यार तुझे ठीक बनाता
शाह नसीर
अब्र-ए-नैसाँ की भी झड़ जाएगी पल में शेख़ी
शाह नसीर
आता है तो आ वादा-फ़रामोश वगर्ना
शाह नसीर
आँखों से तुझ को याद मैं करता हूँ रोज़-ओ-शब
शाह नसीर
आमद-ओ-शुद कूचे में हम उस के क्यूँ न करें मानिंद-ए-नफ़स
शाह नसीर
आईना ले के देख ज़रा अपने हुस्न को
शाह नसीर
आ के सलासिल ऐ जुनूँ क्यूँ न क़दम ले ब'अद-ए-क़ैस
शाह नसीर
तन्हा उठा लूँ मैं भी ज़रा लुत्फ़-ए-गुमरही
शाह दीन हुमायूँ
काफ़िर-ए-इश्क़ हुआ जब से मैं इस दहर में हूँ
शाह आसिम
इस्लाम और कुफ़्र हमारा ही नाम है
शाह आसिम