Couplets Poetry (page 122)
है अयाँ रू-ए-यार आँखों में
शाह आसिम
देख कर मुझ को तुझे क्यूँ है तहय्युर नासेह
शाह आसिम
नई बहार का मुज़्दा बजा सही लेकिन
शफ़क़त काज़मी
कभी तो उन को हमारा ख़याल आएगा
शफ़क़त काज़मी
तुझे हम दोपहर की धूप में देखेंगे ऐ ग़ुंचे
शफ़ीक़ जौनपुरी
कश्ती का ज़िम्मेदार फ़क़त नाख़ुदा नहीं
शफ़ीक़ जौनपुरी
कमाल-ए-आशिक़ी हर शख़्स को हासिल नहीं होता
शफ़ीक़ जौनपुरी
जला वो शम्अ कि आँधी जिसे बुझा न सके
शफ़ीक़ जौनपुरी
इश्क़ की इब्तिदा तो जानते हैं
शफ़ीक़ जौनपुरी
फ़रेब-ए-रौशनी में आने वालो मैं न कहता था
शफ़ीक़ जौनपुरी
आ गया था एक दिन लब पर जफ़ाओं का गिला
शफ़ीक़ जौनपुरी
क़यामत से नहीं कम इंतिज़ार-ए-वस्ल की लज़्ज़त
शफ़क़ इमादपुरी
वो नहा कर ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ को जो बिखराने लगे
शाद लखनवी
वस्ल में बेकार है मुँह पर नक़ाब
शाद लखनवी
विसाल-ए-यार से दूना हुआ इश्क़
शाद लखनवी
सोहबत-ए-वस्ल है मसदूद हैं दर हाए हिजाब
शाद लखनवी
पानी पानी हो ख़जालत से हर इक चश्म-ए-हबाब
शाद लखनवी
न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है
शाद लखनवी
मुश्किल में कब किसी का कोई आश्ना हुआ
शाद लखनवी
ख़ुदा का डर न होता गर बशर को
शाद लखनवी
जवानी से ज़ियादा वक़्त-ए-पीरी जोश होता है
शाद लखनवी
जब जीते-जी न पूछा पूछेंगे क्या मरे पर
शाद लखनवी
इस से बेहतर और कह लेंगे अगर ज़िंदा हैं 'शाद'
शाद लखनवी
हर एक जवाहर बेश-बहा चमका तो ये पत्थर कहने लगा
शाद लखनवी
चश्म-ए-तर ने बहा के जू-ए-सरिश्क
शाद लखनवी
ये बज़्म-ए-मय है याँ कोताह-दोस्ती में है महरूमी
शाद अज़ीमाबादी
तिरा आस्ताँ जो न मिल सका तिरी रहगुज़र की ज़मीं सही
शाद अज़ीमाबादी
तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
शाद अज़ीमाबादी
तलब करें भी तो क्या शय तलब करें ऐ 'शाद'
शाद अज़ीमाबादी
सुनी हिकायत-ए-हस्ती तो दरमियाँ से सुनी
शाद अज़ीमाबादी