Couplets Poetry (page 124)
मैं हाथ बाँधे हुए लौट आई हूँ घर में
शबाना यूसुफ़
ख़ुद चराग़ों को अंधेरों की ज़रूरत है बहुत
शबाना यूसुफ़
इक यही सोच बिछड़ने नहीं देती तुझ से
शबाना यूसुफ़
अगर बिछड़ने का उस से कोई मलाल नहीं
शबाना यूसुफ़
अभी से छोटी हुई जा रही हैं दीवारें
शबाना यूसुफ़
दूर तक फैला हुआ पानी ही पानी हर तरफ़
शबाब ललित
मैं तिरे हुस्न का ख़ल्वत में तमाशाई हूँ
शबाब
ख़त्त-ए-पेशानी में सफ़्फ़ाक अज़ल के दिन से
शबाब
हुई मुद्दत कि मैं ने बुत-परस्ती छोड़ दी ज़ाहिद
शबाब
कितने दिल थे जो हो गए पत्थर
शायर लखनवी
तुम से उल्फ़त के तक़ाज़े न निबाहे जाते
शानुल हक़ हक़्क़ी
लोग तुम से भी सितम-पेशा कहाँ होते हैं
शानुल हक़ हक़्क़ी
बड़ी तलाश से मिलती है ज़िंदगी ऐ दोस्त
शानुल हक़ हक़्क़ी
लज़्ज़त-ए-वस्ल से भी बढ़ के मज़ा आएगा
शाद अमृतसरी
तुम सलामत रहो क़यामत तक
शाद आरफ़ी
शैख़ पर हाथ उठाने के नहीं हम क़ाएल
शाद आरफ़ी
'शाद' ग़ैर-मुमकिन है शिकवा-ए-बुताँ मुझ से
शाद आरफ़ी
रंग लाएगी हमारी तंग-दस्ती एक दिन
शाद आरफ़ी
रफ़्ता रफ़्ता मेरी अल-ग़रज़ी असर करती रही
शाद आरफ़ी
नहीं है इंसानियत के बारे में आज भी ज़ेहन साफ़ जिन का
शाद आरफ़ी
कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी
शाद आरफ़ी
कहीं फ़ितरत बदल सकती है नामों के बदलने से
शाद आरफ़ी
जहान-ए-दर्द में इंसानियत के नाते से
शाद आरफ़ी
जब चली अपनों की गर्दन पर चली
शाद आरफ़ी
देख कर शाइ'र ने उस को नुक्ता-ए-हिकमत कहा
शाद आरफ़ी
वो दर्द है कि दर्द सरापा बना दिया
सेहर इश्क़ाबादी
तेरी जफ़ा वफ़ा सही मेरी वफ़ा जफ़ा सही
सेहर इश्क़ाबादी
पहली सी लज़्ज़तें नहीं अब दर्द-ए-इश्क़ में
सेहर इश्क़ाबादी
हुस्न का हर ख़याल रौशन है
सेहर इश्क़ाबादी
गुज़रने को तो गुज़रे जा रहे हैं राह-ए-हस्ती से
सेहर इश्क़ाबादी