Couplets Poetry (page 126)

कहानी मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है

सीमाब अकबराबादी

कहानी है तो इतनी है फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती की

सीमाब अकबराबादी

जब दिल पे छा रही हों घटाएँ मलाल की

सीमाब अकबराबादी

हुस्न में जब नाज़ शामिल हो गया

सीमाब अकबराबादी

है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू

सीमाब अकबराबादी

हाए 'सीमाब' उस की मजबूरी

सीमाब अकबराबादी

गुनाहों पर वही इंसान को मजबूर करती है

सीमाब अकबराबादी

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है

सीमाब अकबराबादी

दिल-ए-आफ़त-ज़दा का मुद्दआ क्या

सीमाब अकबराबादी

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में

सीमाब अकबराबादी

देखते रहते हैं छुप-छुप के मुरक़्क़ा तेरा

सीमाब अकबराबादी

देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा

सीमाब अकबराबादी

चमक जुगनू की बर्क़-ए-बे-अमाँ मालूम होती है

सीमाब अकबराबादी

बुत करें आरज़ू ख़ुदाई की

सीमाब अकबराबादी

बरहमन कहता था बरहम शैख़ बोल उठा अहद

सीमाब अकबराबादी

अब वहाँ दामन-कशी की फ़िक्र दामन-गीर है

सीमाब अकबराबादी

सर्द होते हुए वजूद में बस

सीमा ग़ज़ल

मुझ को उस के नहीं ख़ुद मेरे हवाले करते

सीमा ग़ज़ल

मैं ने कहा था मुझ को अँधेरे का ख़ौफ़ है

सीमा ग़ज़ल

मैं एक रोज़ उसे ढूँड कर तो ले आऊँ

सीमा ग़ज़ल

ख़ुद अपने-आप से मिलने की ख़ातिर

सीमा ग़ज़ल

जज़्बों पर जब बर्फ़ जमे तो जीना मुश्किल होता है

सीमा ग़ज़ल

एक आवाज़ मैं ने सुनी थी अभी कौन बोला था ये तो ख़बर ही नहीं

सीमा ग़ज़ल

बे-क़रारी से मिरे पास वो आया लेकिन

सीमा ग़ज़ल

ऐसे कुछ हादसे भी गुज़रे हैं

सीमा ग़ज़ल

यही दुआ है वो मेरी दुआ नहीं सुनता

सय्यदा अरशिया हक़

तुम्हें लगता है जो वैसी नहीं हूँ

सय्यदा अरशिया हक़

तुम्हारे ख़त जला कर के तुम्हें यकसर भुला दूँगी

सय्यदा अरशिया हक़

तुम्हारा रोज़ जो मैं सर्फ़ करती रहती हूँ

सय्यदा अरशिया हक़

तुम भी आख़िर हो मर्द क्या जानो

सय्यदा अरशिया हक़