Couplets Poetry (page 125)

एक हम हैं रात भर करवट बदलते ही कटी

सेहर इश्क़ाबादी

आह करता हूँ तो आती है पलट कर ये सदा

सेहर इश्क़ाबादी

ये शराब-ए-इश्क़ ऐ 'सीमाब' है पीने की चीज़

सीमाब अकबराबादी

ये मेरी तीरा-नसीबी ये सादगी ये फ़रेब

सीमाब अकबराबादी

वो दुनिया थी जहाँ तुम बंद करते थे ज़बाँ मेरी

सीमाब अकबराबादी

वो आईना हो या हो फूल तारा हो कि पैमाना

सीमाब अकबराबादी

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

सीमाब अकबराबादी

तुझे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ

सीमाब अकबराबादी

तेरे जल्वों ने मुझे घेर लिया है ऐ दोस्त

सीमाब अकबराबादी

तअ'ज्जुब क्या लगी जो आग ऐ 'सीमाब' सीने में

सीमाब अकबराबादी

'सीमाब' दिल हवादिस-ए-दुनिया से बुझ गया

सीमाब अकबराबादी

सारे चमन को मैं तो समझता हूँ अपना घर

सीमाब अकबराबादी

सहरा से बार बार वतन कौन जाएगा

सीमाब अकबराबादी

रोज़ कहता हूँ कि अब उन को न देखूँगा कभी

सीमाब अकबराबादी

रंग भरते हैं वफ़ा का जो तसव्वुर में तिरे

सीमाब अकबराबादी

क़फ़स की तीलियों में जाने क्या तरकीब रक्खी है

सीमाब अकबराबादी

परेशाँ होने वालों को सुकूँ कुछ मिल भी जाता है

सीमाब अकबराबादी

नशात-ए-हुस्न हो जोश-ए-वफ़ा हो या ग़म-ए-इश्क़

सीमाब अकबराबादी

मोहब्बत में इक ऐसा वक़्त भी आता है इंसाँ पर

सीमाब अकबराबादी

मिरी ख़ामोशियों पर दुनिया मुझ को तअन देती है

सीमाब अकबराबादी

मिरी दीवानगी पर होश वाले बहस फ़रमाएँ

सीमाब अकबराबादी

माज़ी-ए-मरहूम की नाकामियों का ज़िक्र छोड़

सीमाब अकबराबादी

मरकज़ पे अपने धूप सिमटती है जिस तरह

सीमाब अकबराबादी

मंज़िल मिली मुराद मिली मुद्दआ मिला

सीमाब अकबराबादी

मैं देखता हूँ आप को हद्द-ए-निगाह तक

सीमाब अकबराबादी

लहू से मैं ने लिखा था जो कुछ दीवार-ए-ज़िंदाँ पर

सीमाब अकबराबादी

क्यूँ जाम-ए-शराब-ए-नाब माँगूँ

सीमाब अकबराबादी

क्या ढूँढने जाऊँ मैं किसी को

सीमाब अकबराबादी

ख़ुलूस-ए-दिल से सज्दा हो तो उस सज्दे का क्या कहना

सीमाब अकबराबादी

ख़ुदा और नाख़ुदा मिल कर डुबो दें ये तो मुमकिन है

सीमाब अकबराबादी