Couplets Poetry (page 159)

हम को जन्नत की फ़ज़ा से भी ज़ियादा है अज़ीज़

सहर अंसारी

दिलों का हाल तो ये है कि रब्त है न गुरेज़

सहर अंसारी

अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़स्त-ए-महफ़िल

सहर अंसारी

बुझ रहे हैं चराग़-ए-दैर-ओ-हरम

सहाब क़ज़लबाश

ज़रूरत उस की हमें है मगर ये ध्यान रहे

सग़ीर मलाल

ज़माने भर से उलझते हैं जिस की जानिब से

सग़ीर मलाल

उन से बचना कि बिछाते हैं पनाहें पहले

सग़ीर मलाल

तेरे बारे में अगर ख़ामोश हूँ मैं आज तक

सग़ीर मलाल

तमाम वहम ओ गुमाँ है तो हम भी धोका हैं

सग़ीर मलाल

तअज्जुब उन को है क्यूँ मेरी ख़ुद-कलामी पर

सग़ीर मलाल

शिकस्ता-पाई से होती हैं बस्तियाँ आबाद

सग़ीर मलाल

सब सवालों के जवाब एक से हो सकते हैं

सग़ीर मलाल

रौशनी है किसी के होने से

सग़ीर मलाल

मेरे बारे में जो सुना तू ने

सग़ीर मलाल

है एक उम्र से ख़्वाहिश कि दूर जा के कहीं

सग़ीर मलाल

घर के बारे में यही जान सका हूँ अब तक

सग़ीर मलाल

एक रहने से यहाँ वो मावरा कैसे हुआ

सग़ीर मलाल

एक लम्हे में ज़माना हुआ तख़्लीक़ 'मलाल'

सग़ीर मलाल

बस इस ख़याल से देखा तमाम लोगों को

सग़ीर मलाल

ज़ुल्फ़-ए-बरहम की जब से शनासा हुई

साग़र सिद्दीक़ी

ज़िंदगी जब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है

साग़र सिद्दीक़ी

ये किनारों से खेलने वाले

साग़र सिद्दीक़ी

तुम गए रौनक़-ए-बहार गई

साग़र सिद्दीक़ी

तक़दीर के चेहरे की शिकन देख रहा हूँ

साग़र सिद्दीक़ी

रंग उड़ने लगा है फूलों का

साग़र सिद्दीक़ी

नग़्मों की इब्तिदा थी कभी मेरे नाम से

साग़र सिद्दीक़ी

मुस्कुराओ बहार के दिन हैं

साग़र सिद्दीक़ी

मौत कहते हैं जिस को ऐ 'साग़र'

साग़र सिद्दीक़ी

मर गए जिन के चाहने वाले

साग़र सिद्दीक़ी

मैं ने जिन के लिए राहों में बिछाया था लहू

साग़र सिद्दीक़ी