Couplets Poetry (page 158)
किस तसव्वुर के तहत रब्त की मंज़िल में रहा
साहिल अहमद
कल तलक सहरा बसा था आँख में
साहिल अहमद
बकरी ''में-में'' करती है
साहिल अहमद
अब के वो ऐसे सफ़र पर क्या गए
साहिल अहमद
आज कुआँ भी चीख़ उठा है
साहिल अहमद
बंद आँखें करूँ और ख़्वाब तुम्हारे देखूँ
साहिबा शहरयार
तुम ने कहा था चुप रहना सो चुप ने भी क्या काम किया
सहबा अख़्तर
सुबूत माँग रहे हैं मिरी तबाही का
सहबा अख़्तर
शायद वो संग-दिल हो कभी माइल-ए-करम
सहबा अख़्तर
'सहबा' साहब दरिया हो तो दरिया जैसी बात करो
सहबा अख़्तर
मिरी तन्हाइयों को कौन समझे
सहबा अख़्तर
मेरे सुख़न की दाद भी उस को ही दीजिए
सहबा अख़्तर
मैं उसे समझूँ न समझूँ दिल को होता है ज़रूर
सहबा अख़्तर
हमें ख़बर है ज़न-ए-फ़ाहिशा है ये दुनिया
सहबा अख़्तर
दिल के उजड़े नगर को कर आबाद
सहबा अख़्तर
बयान-ए-लग़्ज़िश-ए-आदम न कर कि वो फ़ित्ना
सहबा अख़्तर
अगर शुऊर न हो तो बहिश्त है दुनिया
सहबा अख़्तर
ये मरना जीना भी शायद मजबूरी की दो लहरें हैं
सहर अंसारी
तिरी आरज़ू से भी क्यूँ नहीं ग़म-ए-ज़िंदगी में कोई कमी
सहर अंसारी
तंग आते भी नहीं कशमकश-ए-दहर से लोग
सहर अंसारी
शिकवा-ए-तलख़ी-ए-हालात बजा है लेकिन
सहर अंसारी
शायद कि वो वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-सफ़र से
सहर अंसारी
सदा अपनी रविश अहल-ए-ज़माना याद रखते हैं
सहर अंसारी
न अब वो शिद्दत-ए-आवारगी न वहशत-ए-दिल
सहर अंसारी
मिरे लहू को मिरी ख़ाक-ए-नागुज़ीर को देख
सहर अंसारी
मौत के बाद ज़ीस्त की बहस में मुब्तला थे लोग
सहर अंसारी
महफ़िल-आराई हमारी नहीं इफ़रात का नाम
सहर अंसारी
कैसी कैसी महफ़िलें सूनी हुईं
सहर अंसारी
जिसे गुज़ार गए हम बड़े हुनर के साथ
सहर अंसारी
जाने क्यूँ रंग-ए-बग़ावत नहीं छुपने पाता
सहर अंसारी