Couplets Poetry (page 161)

वो सवाल-ए-लुत्फ़ पर पत्थर न बरसाएँ तो क्यूँ

साग़र निज़ामी

वो मिरी ख़ाक-नशीनी के मज़े क्या जाने

साग़र निज़ामी

तेरे नग़्मों से है रग रग में तरन्नुम पैदा

साग़र निज़ामी

तख़्लीक़ अँधेरों से किए हम ने उजाले

साग़र निज़ामी

सज्दे मिरी जबीं के नहीं इस क़दर हक़ीर

साग़र निज़ामी

सैलाब-ए-तबस्सुम से दरमान-ए-जराहत कर

साग़र निज़ामी

नज़र करम की फ़रावानियों पे पड़ती है

साग़र निज़ामी

ख़िरामाँ ख़िरामाँ मोअत्तर मोअत्तर

साग़र निज़ामी

काफ़िर गेसू वालों की रात बसर यूँ होती है

साग़र निज़ामी

हुस्न ने दस्त-ए-करम खींच लिया है क्या ख़ूब

साग़र निज़ामी

गुल अपने ग़ुंचे अपने गुल्सिताँ अपना बहार अपनी

साग़र निज़ामी

दिल की बर्बादियों का रोना क्या

साग़र निज़ामी

ढूँढने को तुझे ओ मेरे न मिलने वाले

साग़र निज़ामी

आओ इक सज्दा करूँ आलम-ए-बद-सम्ती में

साग़र निज़ामी

आँख तुम्हारी मस्त भी है और मस्ती का पैमाना भी

साग़र निज़ामी

ख़ाक थी और जिस्म ओ जाँ कहते रहे

साग़र मेहदी

वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ लड़ा लेते थे

साग़र ख़य्यामी

उस वक़्त मुझ को दावत-ए-जाम-ओ-सुबू मिली

साग़र ख़य्यामी

तस्वीर आज देख के अहद-ए-शबाब की

साग़र ख़य्यामी

'साग़र' बहुत गुज़ारी गुनाहों में ज़िंदगी

साग़र ख़य्यामी

नफ़रतों की जंग में देखो तो क्या क्या खो गया

साग़र ख़य्यामी

मुद्दत हुई है बिछड़े हुए अपने-आप से

साग़र ख़य्यामी

कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर

साग़र ख़य्यामी

ख़ुद तो कभी न आएगी होंटों पे अब हँसी

साग़र ख़य्यामी

कौन कहता है बुलंदी पे नहीं हूँ 'सागर'

साग़र ख़य्यामी

जान जाने को है और रक़्स में परवाना है

साग़र ख़य्यामी

इंजीनियर करेंगे अगर डॉक्टर का काम

साग़र ख़य्यामी

इक अजब चीज़ है शराफ़त भी

साग़र ख़य्यामी

ये जो दीवार पे कुछ नक़्श हैं धुँदले धुँदले

साग़र आज़मी

उस के जज़्बात से यूँ खेल रहा हूँ 'साग़र'

साग़र आज़मी