Couplets Poetry (page 162)
तुम से मिलती-जुलती मैं आवाज़ कहाँ से लाऊँगा
साग़र आज़मी
तुम क्या जानो अपने आप से कितना मैं शर्मिंदा हूँ
साग़र आज़मी
शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो 'साग़र'
साग़र आज़मी
शाम ढले ये सोच के बैठे हम अपनी तस्वीर के पास
साग़र आज़मी
मुझ में और तुझ में है ये फ़र्क़ तो अब भी क़ाइम
साग़र आज़मी
किस तरह भुलाएँ हम इस शहर के हंगामे
साग़र आज़मी
कश्मीर की वादी में बे-पर्दा जो निकले हो
साग़र आज़मी
इतना नाराज़ हो क्यूँ उस ने जो पत्थर फेंका
साग़र आज़मी
देवता मेरे आँगन में उतरेंगे कब ज़िंदगी भर यही सोचता रह गया
साग़र आज़मी
बैठे थे जब तो सारे परिंदे थे साथ साथ
साग़र आज़मी
रोना मुझे ख़िज़ाँ का नहीं कुछ मगर 'शमीम'
सफ़िया शमीम
जिस को दिल से लगा के रक्खा था
सफ़िया शमीम
होश आया तो कहीं कुछ भी न था
सफ़िया शमीम
होना है दर्द-ए-इश्क़ से गर लज़्ज़त-आश्ना
सफ़िया शमीम
दश्त गुलज़ार हुआ जाता है
सफ़िया शमीम
बहार-ए-नौ की फिर है आमद आमद
सफ़िया शमीम
पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे
सफ़ी लखनवी
मिरी नाश के सिरहाने वो खड़े ये कह रहे हैं
सफ़ी लखनवी
ख़त्म हो जाते जो हुस्न ओ इश्क़ के नाज़ ओ अदा
सफ़ी लखनवी
कल हम आईने में रुख़ की झुर्रियाँ देखा किए
सफ़ी लखनवी
जनाज़ा रोक कर मेरा वो इस अंदाज़ से बोले
सफ़ी लखनवी
ग़ज़ल उस ने छेड़ी मुझे साज़ देना
सफ़ी लखनवी
दें भी जवाब-ए-ख़त कि न दें क्या ख़बर मुझे
सफ़ी लखनवी
देखे बग़ैर हाल ये है इज़्तिराब का
सफ़ी लखनवी
बनावट हो तो ऐसी हो कि जिस से सादगी टपके
सफ़ी लखनवी
ख़ुद-सर है अगर वो तो मरासिम न बढ़ाओ
सफ़दर सलीम सियाल
इक ख़्वाब सा देखा था तो मैं काँप उठा था
सफ़दर सलीम सियाल
अपनी साँसें मिरी साँसों में मिला के रोना
सफ़दर सलीम सियाल
नहीं माँगते मस्ती-ए-जावेदाँ
सफ़दर मीर
तुम नहीं ग़म नहीं शराब नहीं
सईद राही