Couplets Poetry (page 176)
उम्र भर तुझ को देखने पर भी
रिफ़अत सुलतान
तू मिरी बात का जवाब न दे
रिफ़अत सुलतान
मुझे भी यूँ तो बड़ी आरज़ू है जीने की
रिफ़अत सुलतान
जी रहा हूँ कुछ इस तरह जैसे
रिफ़अत सुलतान
जलता रहा हूँ ज़ीस्त के दोज़ख़ में उम्र भर
रिफ़अत सुलतान
ग़म-ए-हयात से इतनी भी है कहाँ फ़ुर्सत
रिफ़अत सुलतान
दिल में कोई ख़ुशी नहीं लेकिन
रिफ़अत सुलतान
अब इस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी मुझ को
रिफ़अत सुलतान
वक़्त ख़ुश ख़ुश काटने का मशवरा देते हुए
रियाज़ मजीद
सिमटती फैलती तन्हाई सोते जागते दर्द
रियाज़ मजीद
इसी हुजूम में लड़-भिड़ के ज़िंदगी कर लो
रियाज़ मजीद
इक घर बना के कितने झमेलों में फँस गए
रियाज़ मजीद
तेरे बिन घड़ियाँ गिनी हैं रात दिन
रहमान फ़ारिस
कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
रहमान फ़ारिस
जो भीक माँगते हुए बच्चे के पास था
रेहाना रूही
हर दिसम्बर इसी वहशत में गुज़ारा कि कहीं
रेहाना रूही
नई फ़ज़ा में नई दोस्ती पनप न सकी
रज़्ज़ाक़ अरशद
हुए ख़त्म सिगरेट अब क्या करें हम
रज़्ज़ाक़ अरशद
जिस को तुम कहते हो ख़ुश-बख़्त सदा है मज़लूम
रज़िया फ़सीह अहमद
इक सहीफ़ा नया उतरा है सुना है लोगो
रज़िया फ़सीह अहमद
इक सहीफ़ा नया उतरा है सुना है लोगो
रज़िया फ़सीह अहमद
ये ज़ुल्फ़-ए-यार भी क्या बिजलियों का झुरमुट है
रज़ी रज़ीउद्दीन
तमाम रात तिरा इंतिज़ार होता रहा
रज़ी रज़ीउद्दीन
जगह बची ही नहीं दिल पे चोट खाने की
रज़ी रज़ीउद्दीन
मुझ को पाना है तो फिर मुझ में उतर कर देखो
राज़ी अख्तर शौक़
हम रूह-ए-सफ़र हैं हमें नामों से न पहचान
राज़ी अख्तर शौक़
हम इतने परेशाँ थे कि हाल-ए-दिल-ए-सोज़ाँ
राज़ी अख्तर शौक़
दो बादल आपस में मिले थे फिर ऐसी बरसात हुई
राज़ी अख्तर शौक़
अब कैसे चराग़ क्या चराग़ाँ
राज़ी अख्तर शौक़
है एक बात जो मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू बनती
रज़ा नक़वी वाही