Couplets Poetry (page 178)
इक दम के वास्ते न किया क्या क्या ऐ 'रज़ा'
रज़ा अज़ीमाबादी
देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में
रज़ा अज़ीमाबादी
चला है काबे को बुत-ख़ाने से 'रज़ा' यारो
रज़ा अज़ीमाबादी
ऐसा किसी से जुनूँ दस्त-ओ-गरेबाँ न हो
रज़ा अज़ीमाबादी
महरूमियों का अपनी न शिकवा हो क्यूँ हमें
रज़ा अमरोही
ज़िंदगी महव-ए-ख़ुद-आराई थी
रविश सिद्दीक़ी
वो शख़्स अपनी जगह है मुरक़्क़ा-ए-तहज़ीब
रविश सिद्दीक़ी
वो कहाँ दर्द जो दिल में तिरे महदूद रहा
रविश सिद्दीक़ी
उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है
रविश सिद्दीक़ी
तल्ख़ी-ए-ज़िंदगी अरे तौबा
रविश सिद्दीक़ी
सख़्त जान-लेवा है सादगी मोहब्बत की
रविश सिद्दीक़ी
नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं
रविश सिद्दीक़ी
लड़खड़ाना भी है तकमील-ए-सफ़र की तम्हीद
रविश सिद्दीक़ी
कोह संगीन हक़ाएक़ था जहाँ
रविश सिद्दीक़ी
ख़ून-ए-दिल सर्फ़ कर रहा हूँ 'रविश'
रविश सिद्दीक़ी
जो राह अहल-ए-ख़िरद के लिए है ला-महदूद
रविश सिद्दीक़ी
इश्क़ ख़ुद अपनी जगह मज़हर-ए-अनवार-ए-ख़ुदा
रविश सिद्दीक़ी
हज़ार रुख़ तिरे मिलने के हैं न मिलने में
रविश सिद्दीक़ी
हज़ार हुस्न दिल-आरा-ए-दो-जहाँ होता
रविश सिद्दीक़ी
दिल गवारा नहीं करता है शिकस्त-ए-उम्मीद
रविश सिद्दीक़ी
दर्द आलूदा-ए-दरमाँ था 'रविश'
रविश सिद्दीक़ी
बुतान-ए-शहर को ये ए'तिराफ़ हो कि न हो
रविश सिद्दीक़ी
अब इस से क्या ग़रज़ ये हरम है कि दैर है
रविश सिद्दीक़ी
उड़ जाऊँगा बहार में मानिंद-ए-बू-ए-गुल
रौनक़ टोंकवी
आज क़ातिल का गले पर मिरे ख़ंजर चमका
रौनक़ टोंकवी
सैकड़ों पुल बने फ़ासले भी मिटे
रौनक़ नईम
इन दरख़्तों से भी नाता जोड़िए
रौनक़ नईम
हालात-ए-ख़ूँ-आशाम से ग़ाफ़िल नहीं लेकिन
रौनक़ नईम
गली गली में तकल्लुफ़ की धूल होती है
रौनक़ नईम
बेहतर है अब दूर रहो तुम टेसू के इन फूलों से
रौनक़ नईम