Couplets Poetry (page 179)

यूँही हँसते हुए छोड़ेंगे ग़ज़ल की महफ़िल

रउफ़ रज़ा

वो ये कहते हैं सदा हो तो तुम्हारे जैसी

रउफ़ रज़ा

खिलौने की तड़प में ख़ुद खिलौना वो न बन जाए

रऊफ़ ख़ैर

नमाज़-ए-इश्क़ तुम्हारी क़ुबूल हो जाती

रतन पंडोरवी

वो अहल-ए-कहफ़ थे जिन को ज़िया मिली आख़िर

रासिख़ इरफ़ानी

कितना नादिम हूँ किसी शख़्स से शिकवा कर के

रासिख़ इरफ़ानी

अटा है शहर बारूदी धुएँ से

रासिख़ इरफ़ानी

शागिर्द हैं हम 'मीर' से उस्ताद के 'रासिख़'

रासिख़ अज़ीमाबादी

जब तुझे ख़ुद आप से बेगानगी हो जाएगी

रासिख़ अज़ीमाबादी

बाज़ार जहाँ में कोई ख़्वाहाँ नहीं तेरा

रासिख़ अज़ीमाबादी

लोग पत्थर के थे फ़रियाद कहाँ तक करते

राशिद तराज़

अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूँ

राशिद राही

दर्द की हद से गुज़रना तो अभी बाक़ी है

राशिद कामिल

मैं अभी उस के तसव्वुर में मगन हूँ 'राशिद'

राशिद हामिदी

आग बरसाए ख़ुशी से कोई सूरज से कहो

राशिद हामिदी

अब तो इक पल के लिए भी न गंवाएँगे तुम्हें

राशिद अनवर राशिद

जिन हाथों से बटती ख़ैरातें देखी थीं

राशिद आज़र

देखने वाले यूँ तो बहुत देखे हैं लेकिन

राशिद आज़र

आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले

रशीद रामपुरी

ज़िंदगी कहते हैं किस को मौत किस का नाम है

रशीद लखनवी

सिए जाते हैं कफ़न आप के दीवानों के

रशीद लखनवी

कभी मदफ़ून हुए थे जिस जगह पर कुश्ता-ए-अबरू

रशीद लखनवी

वक़्त के क़द्र-दाँ की नज़रों में

रशीद कौसर फ़ारूक़ी

घर भी है घर में सभी अपने भी हैं

रशीद अफ़रोज़

वो ख़ुश किसी के साथ हैं ना-ख़ुश किसी के साथ

रसा रामपुरी

बड़ी ही धूम से दावत हो फिर तो ज़ाहिद की

रसा रामपुरी

बअ'द-ए-फ़ना भी ख़ैर से तन्हा नहीं हैं हम

रसा रामपुरी

आए अगर क़यामत तो धज्जियाँ उड़ा दें

रसा रामपुरी

उठा लाया हूँ सारे ख़्वाब अपने

रसा चुग़ताई

उठ रहा है धुआँ मिरे घर में

रसा चुग़ताई