Couplets Poetry (page 180)
उस से कहना कि कभी आ के मिले
रसा चुग़ताई
उन झील सी गहरी आँखों में
रसा चुग़ताई
तुझ से मिलने को बे-क़रार था दिल
रसा चुग़ताई
तिरे नज़दीक आ कर सोचता हूँ
रसा चुग़ताई
तेरे आने का इंतिज़ार रहा
रसा चुग़ताई
सिर्फ़ माने थी हया बंद-ए-क़बा खुलने तलक
रसा चुग़ताई
शेर-ओ-सुख़न का शहर नहीं ये शहर-ए-इज़्ज़त-ए-दारां है
रसा चुग़ताई
शहर में जैसे कोई आसेब है
रसा चुग़ताई
सहरा-ए-बे-ख़याल में जल-थल कहाँ के हैं
रसा चुग़ताई
मिट्टी जब तक नम रहती है
रसा चुग़ताई
कौन दिल की ज़बाँ समझता है
रसा चुग़ताई
जिन आँखों से मुझे तुम देखते हो
रसा चुग़ताई
इश्क़ में भी सियासतें निकलीं
रसा चुग़ताई
इस घर की सारी दीवारें शीशे की हैं
रसा चुग़ताई
हम किसी को गवाह क्या करते
रसा चुग़ताई
हुईं आँखें अजब बेहाल अब के
रसा चुग़ताई
है कोई यहाँ शहर में ऐसा कि जिसे मैं
रसा चुग़ताई
हाल-ए-दिल पूछते हो क्या तुम ने
रसा चुग़ताई
घर में जी लगता नहीं और शहर के
रसा चुग़ताई
दिल धड़कता है सर-ए-राह-ए-ख़याल
रसा चुग़ताई
चाँद होता नहीं हर इक चेहरा
रसा चुग़ताई
बारहा हम पे क़यामत गुज़री
रसा चुग़ताई
बहुत दिनों से कोई हादसा नहीं गुज़रा
रसा चुग़ताई
बहुत दिनों में ये उक़्दा खुला कि मैं भी हूँ
रसा चुग़ताई
और कुछ यूँ हुआ कि बच्चों ने
रसा चुग़ताई
अल्फ़ाज़ में बंद हैं मआनी
रसा चुग़ताई
अक्स-ए-ज़ुल्फ़-ए-रवाँ नहीं जाता
रसा चुग़ताई
आरिज़ों को तिरे कँवल कहना
रसा चुग़ताई
आज मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है हयात
रसा चुग़ताई
आहटें सुन रहा हूँ यादों की
रसा चुग़ताई