Couplets Poetry (page 182)
अब मुझे थोड़ी सी ग़फ़लत से भी डर लगता है
राणा गन्नौरी
आज बार-ए-गोश है मेरी सदा उस को मगर
राणा गन्नौरी
ज़िंदगी देख तिरी ख़ास रिआयत होगी
राना आमिर लियाक़त
वस्ल नुक़सान कर गया मेरा
राना आमिर लियाक़त
उसे पता है कहाँ हाथ थामना है मिरा
राना आमिर लियाक़त
तुझ से कहना था हाल-ए-दिल लेकिन
राना आमिर लियाक़त
तुझ आँख से झलकता था एहसास-ए-ज़िंदगी
राना आमिर लियाक़त
क़ीमती शय थी तिरा हिज्र उठाए रक्खा
राना आमिर लियाक़त
नुक्ता यही अज़ल से पढ़ाया गया हमें
राना आमिर लियाक़त
मोहब्बतों के लिए उम्र कम है सो वो शख़्स
राना आमिर लियाक़त
मानूस रौशनी हुई मेरे मकान से
राना आमिर लियाक़त
मैं उस की नज़रों का कुछ इस लिए भी हूँ क़ाइल
राना आमिर लियाक़त
मैं जानता हूँ मोहब्बत में क्या नहीं करना
राना आमिर लियाक़त
मैं हाव-हू पे कहानी को ख़त्म कर दूँगा
राना आमिर लियाक़त
ख़ुदा का शुक्र कि आहट से ख़्वाब टूट गया
राना आमिर लियाक़त
कई तरह के तहाइफ़ पसंद हैं उस को
राना आमिर लियाक़त
इस दौर-ए-ना-मुराद से ये तजरबा हुआ
राना आमिर लियाक़त
ईंट से ईंट जोड़ कर, ख़्वाब बना रहा हूँ मैं
राना आमिर लियाक़त
हज़ार रस्ते तिरे हिज्र के इलाज के हैं
राना आमिर लियाक़त
हर साँस नई साँस है हर दिन है मिरा दिन
राना आमिर लियाक़त
गले लगा के मुझे पूछ मसअला क्या है
राना आमिर लियाक़त
दिल क़नाअत ज़रा सी करता तो
राना आमिर लियाक़त
दिल इक ऐसा कासा है जिस की गहराई मत पूछो
राना आमिर लियाक़त
अपना आप पड़ा रह जाता है बस इक अंदाज़े पर
राना आमिर लियाक़त
ऐसी प्यारी शाम में जी बहलाने को
राना आमिर लियाक़त
अगरचे रोज़ मिरा सब्र आज़माता है
राना आमिर लियाक़त
आओ आँखें मिला के देखते हैं
राना आमिर लियाक़त
आधे घर में मैं होता हूँ आधे घर में तन्हाई
राना आमिर लियाक़त
यानी कोई कमी नहीं मुझ में
रम्ज़ी असीम
या उन्हें आती नहीं बज़्म-ए-सुख़न-आराई
रम्ज़ी असीम