Couplets Poetry (page 184)

वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वो लोग जो कभी बाहर न घर से झाँकते थे

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वो हँसते खेलते इक लफ़्ज़ कह गया 'बानी'

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वो एक अक्स कि पल भर नज़र में ठहरा था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वही इक मौसम-ए-सफ़्फ़ाक था अंदर भी बाहर भी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

उदास शाम की यादों भरी सुलगती हवा

राजेन्द्र मनचंदा बानी

उड़ चला वो इक जुदा ख़ाका लिए सर में अकेला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

थी पाँव में कोई ज़ंजीर बच गए वर्ना

राजेन्द्र मनचंदा बानी

शामिल हूँ क़ाफ़िले में मगर सर में धुँद है

राजेन्द्र मनचंदा बानी

फैलती जाएगी चारों सम्त इक ख़ुश-रौनक़ी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

पैहम मौज-ए-इमकानी में

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ओस से प्यास कहाँ बुझती है

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मोहब्बतें न रहीं उस के दिल में मेरे लिए

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मिरे वास्ते जाने क्या लाएगी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मिरे बनाए हुए बुत में रूह फूँक दे अब

राजेन्द्र मनचंदा बानी

माज़ी से उभरीं वो ज़िंदा तस्वीरें

राजेन्द्र मनचंदा बानी

कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख

राजेन्द्र मनचंदा बानी

किसी मक़ाम से कोई ख़बर न आने की

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इस तमाशे में तअस्सुर कोई लाने के लिए

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इस क़दर ख़ाली हुआ बैठा हूँ अपनी ज़ात में

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इस अँधेरे में न इक गाम भी रुकना यारो

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हरी सुनहरी ख़ाक उड़ाने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ढलेगी शाम जहाँ कुछ नज़र न आएगा

राजेन्द्र मनचंदा बानी

चलो कि जज़्बा-ए-इज़हार चीख़ में तो ढला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

'बानी' ज़रा सँभल के मोहब्बत का मोड़ काट

राजेन्द्र मनचंदा बानी

बैन करती हुई सम्तों से न डरना 'बानी'

राजेन्द्र मनचंदा बानी

बगूले उस के सर पर चीख़ते थे

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

आज क्या लौटते लम्हात मयस्सर आए

राजेन्द्र मनचंदा बानी