Couplets Poetry (page 186)

इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़ियादा थी

राजेश रेड्डी

हाथ उठाता है दुआओं को फ़लक भी उस दम

राजेश रेड्डी

ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर

राजेश रेड्डी

दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त

राजेश रेड्डी

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह

राजेश रेड्डी

दिल भी बच्चे की तरह ज़िद पे अड़ा था अपना

राजेश रेड्डी

बुलंदी के लिए बस अपनी ही नज़रों से गिरना था

राजेश रेड्डी

बहाना कोई तो ऐ ज़िंदगी दे

राजेश रेड्डी

बड़ी तस्वीर लटका दी है अपनी

राजेश रेड्डी

अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास

राजेश रेड्डी

आदमी ही के बनाए हुए ज़िंदाँ हैं ये सब

राजेश रेड्डी

मैं था किसी की याद थी जाम-ए-शराब था

राजेन्द्र नाथ रहबर

कहीं ज़मीं से तअल्लुक़ न ख़त्म हो जाए

राजेन्द्र नाथ रहबर

एक दिन भीगे थे बरसात में हम तुम दोनों

राजेन्द्र नाथ रहबर

बैठे रहो कुछ देर अभी और मुक़ाबिल

राजेन्द्र नाथ रहबर

नादान कह रहे हैं जिसे आफ़्ताब-ए-हश्र

रजब अली बेग सुरूर

न पहुँचा गोश तक इक तेरे हैहात

रजब अली बेग सुरूर

लाज़िम है सोज़-ए-इश्क़ का शो'ला अयाँ न हो

रजब अली बेग सुरूर

क्या यही थी शर्त कुछ इंसाफ़ की ऐ तुंद-ख़ू

रजब अली बेग सुरूर

दम-ए-तकफ़ीन भी गर यार आवे

रजब अली बेग सुरूर

अब है दुआ ये अपनी हर शाम हर सहर को

रजब अली बेग सुरूर

रो रो के याद करती हूँ फ़ादर मदर को मैं

राजा मेहदी अली ख़ाँ

किस की आँखों से गिरा है ये

राजा मेहदी अली ख़ाँ

मिलने को यूँ तो मिलते थे कुछ लोग रोज़ ही

राज खेती

तिरे सुलूक का ग़म सुब्ह-ओ-शाम क्या करते

रईस सिद्दीक़ी

न नींद आँखों में बाक़ी न इंतिज़ार रहा

रईस सिद्दीक़ी

बस इक ख़ता की मुसलसल सज़ा अभी तक है

रईस सिद्दीक़ी

मैं ने कितने रस्ते बदले लेकिन हर रस्ते में 'फ़रोग़'

रईस फ़रोग़

लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं

रईस फ़रोग़

इश्क़ वो कार-ए-मुसलसल है कि हम अपने लिए

रईस फ़रोग़