Couplets Poetry (page 185)
ये नाज़ुक लब हैं या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ
राजेन्द्र कृष्ण
न झटको ज़ुल्फ़ से पानी ये मोती टूट जाएँगे
राजेन्द्र कृष्ण
न चारागर की ज़रूरत न कुछ दवा की है
राजेन्द्र कृष्ण
मुरझा चुका है फिर भी ये दिल फूल ही तो है
राजेन्द्र कृष्ण
हमें वास्ता तड़प से हमें काम आँसुओं से
राजेन्द्र कृष्ण
इक मोहब्बत के सिवा और न कुछ माँगा था
राजेन्द्र कृष्ण
इक छोटा सा था मेरा आशियाँ
राजेन्द्र कृष्ण
ये जो ज़िंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है
राजेश रेड्डी
यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है
राजेश रेड्डी
या ख़ुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार
राजेश रेड्डी
वो दिल से कम ज़बाँ ही से ज़ियादा बात करता था
राजेश रेड्डी
सोच लो कल कहीं आँसू न बहाने पड़ जाएँ
राजेश रेड्डी
शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
राजेश रेड्डी
साथ 'ग़ालिब' के गई फ़िक्र की गहराई भी
राजेश रेड्डी
सब लोग इस से पहले कि देवता समझते
राजेश रेड्डी
नींद को ढूँड के लाने की दवाएँ थीं बहुत
राजेश रेड्डी
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं
राजेश रेड्डी
मिरी इक ज़िंदगी के कितने हिस्से-दार हैं लेकिन
राजेश रेड्डी
मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
राजेश रेड्डी
मयस्सर मुफ़्त में थे आसमाँ के चाँद तारे तक
राजेश रेड्डी
मैं ने तो ब'अद में तोड़ा था इसे
राजेश रेड्डी
क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून
राजेश रेड्डी
कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ
राजेश रेड्डी
कुछ इस तरह गुज़ारा है ज़िंदगी को हम ने
राजेश रेड्डी
किया ईजाद जिस ने भी ख़ुदा को
राजेश रेड्डी
किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता
राजेश रेड्डी
किस ने पाया सुकून दुनिया में
राजेश रेड्डी
कौन पढ़ता है यहाँ खोल के अब दिल की किताब
राजेश रेड्डी
जुस्तुजू का इक अजब सिलसिला ता-उम्र रहा
राजेश रेड्डी
जितनी बटनी थी बट चुकी ये ज़मीं
राजेश रेड्डी