Couplets Poetry (page 183)
तुम्हारे साथ कई रंज बाँटने हैं हमें
रम्ज़ी असीम
तमाम शहर गिरफ़्तार है अज़िय्यत में
रम्ज़ी असीम
मिरी जगह पे कोई और हो तो चीख़ उट्ठे
रम्ज़ी असीम
खींच लाई है तिरे दश्त की वहशत वर्ना
रम्ज़ी असीम
इश्क़ था और अक़ीदत से मिला करते थे
रम्ज़ी असीम
दश्त की प्यास किसी तौर बुझाई जाती
रम्ज़ी असीम
रख लिया बार-ए-अमानत सर पे बे-ख़ौफ़ी के साथ
रम्ज़ आफ़ाक़ी
ज़िंदगी तो सपना है कौन 'राम' अपना है
राम रियाज़
ज़िंदगी कशमकश-ए-वक़्त में गुज़री अपनी
राम रियाज़
तिरे इंतिज़ार में इस तरह मिरा अहद-ए-शौक़ गुज़र गया
राम रियाज़
जो तेरे ग़म में जले हैं वो फिर बुझे ही नहीं
राम रियाज़
हम ओस के क़तरे हैं कि बिखरे हुए मोती
राम रियाज़
अब कहाँ वो पहली सी फ़ुर्सतें मयस्सर हैं
राम रियाज़
आँसू जो बहें सुर्ख़ तो हो जाती हैं आँखें
राम रियाज़
ज़रा देखें तो दुनिया कैसे कैसे रंग भरती है
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
तेरा होना न मान कर गोया
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शाम-ए-अवध ने ज़ुल्फ़ में गूँधे नहीं हैं फूल
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
सफ़र का रुख़ बदल कर देखता हूँ
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
रह-ए-क़रार अजब राह-ए-बे-क़रारी है
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
नवाज़ा है मुझे पत्थर से जिस ने
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
नामूस-ए-ज़िंदगी ग़म-ए-इंसाँ में ढाल कर
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
न आए मेरे होंटों तक जो पैमाना नहीं आता
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
मैं कैसे तय करूँ बे-सम्त रास्तों का सफ़र
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
लम्हा लम्हा बिखर रहा हूँ मैं
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
जो छू लूँ आसमाँ पाँव की धरती खींच लेता है
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
दुनिया तेरे नाम से मुझ को पहचाने
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
दिल का सुकून रिज़्क़ के हंगामे खा गए
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
देख लिया क्या जाने शाम की सूनी आँखों में
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
बे-दीन हुए ईमान दिया हम इश्क़ में सब कुछ खो बैठे
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
ज़रा छुआ था कि बस पेड़ आ गिरा मुझ पर
राजेन्द्र मनचंदा बानी