Couplets Poetry (page 177)

ज़िंदगी अब इस क़दर सफ़्फ़ाक हो जाएगी क्या

रज़ा मौरान्वी

बुलाते हैं हमें मेहनत-कशों के हाथ के छाले

रज़ा मौरान्वी

ता'ना देते हो मुझे जीने का

रज़ा हमदानी

क़ुर्बत तिरी किस को रास आई

रज़ा हमदानी

पास-ए-आदाब-ए-वफ़ा था कि शिकस्ता-पाई

रज़ा हमदानी

गोया थे तो कोई भी नहीं था

रज़ा हमदानी

बिखर गया हूँ फ़ज़ाओं में बू-ए-गुल की तरह

रज़ा हमदानी

भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो

रज़ा हमदानी

अजब चीज़ है ये मोहब्बत की बाज़ी

रज़ा हमदानी

ज़ख़्म के लगते ही क्या खुल गए छाती के किवाड़

रज़ा अज़ीमाबादी

यारब तू उस के दिल से सदा रखियो ग़म को दूर

रज़ा अज़ीमाबादी

सुनते तो थे 'रज़ा' हैं सब हैं बड़े मुसलमाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

सौ ईद अगर ज़माने में लाए फ़लक व-लेक

रज़ा अज़ीमाबादी

सौ ग़म्ज़े के रखता है निगहबान पस-ओ-पेश

रज़ा अज़ीमाबादी

सब कुछ पढ़ाया हम को मुदर्रिस ने इश्क़ के

रज़ा अज़ीमाबादी

रफ़ू फिर कीजियो पैराहन-ए-यूसुफ़ को ऐ ख़य्यात

रज़ा अज़ीमाबादी

नौ-मश्क़-ए-इश्क़ हैं हम आहें करें अजब क्या

रज़ा अज़ीमाबादी

न काबा है यहाँ मेरे न है बुत-ख़ाना पहलू में

रज़ा अज़ीमाबादी

क्या कहें अपनी सियह-बख़्ती ही का अंधेर है

रज़ा अज़ीमाबादी

किस तरह 'रज़ा' तू न हो धवाने ज़माना

रज़ा अज़ीमाबादी

ख़्वाह काफ़िर मुझे कह ख़्वाह मुसलमान ऐ शैख़

रज़ा अज़ीमाबादी

ख़ुशा हो कर बुताँ कब आशिक़ों को याद करते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

काबे में शैख़ मुझ को समझे ज़लील लेकिन

रज़ा अज़ीमाबादी

काबा ओ दैर जिधर देखा उधर कसरत है

रज़ा अज़ीमाबादी

जिस तरह हम रहे दुनिया में हैं उस तरह 'रज़ा'

रज़ा अज़ीमाबादी

इस चश्म ओ दिल ने कहना न माना तमाम उम्र

रज़ा अज़ीमाबादी

इमारत दैर ओ मस्जिद की बनी है ईंट ओ पत्थर से

रज़ा अज़ीमाबादी

इलाही चश्म-ए-बद उस से तू दूर ही रखियो

रज़ा अज़ीमाबादी

हम को मिली है इश्क़ से इक आह-ए-सोज़-नाक

रज़ा अज़ीमाबादी

गर गरेबाँ सिया तो क्या नासेह

रज़ा अज़ीमाबादी