Couplets Poetry (page 175)
लाएगी गर्दिश में तुझ को भी मिरी आवारगी
रिन्द लखनवी
क्या सुन चुके हैं आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार हाथ
रिन्द लखनवी
क्या मिला अर्ज़-ए-मुद्दआ कर के
रिन्द लखनवी
किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम है
रिन्द लखनवी
खुली है कुंज-ए-क़फ़स में मिरी ज़बाँ सय्याद
रिन्द लखनवी
ख़ाक छनवाती है दीवानों से अपने मुद्दतों
रिन्द लखनवी
करीम जो मुझे देता है बाँट खाता हूँ
रिन्द लखनवी
काफ़िर हूँ न फूँकूँ जो तिरे काबे में ऐ शैख़
रिन्द लखनवी
काबे को जाता किस लिए हिन्दोस्तान से मैं
रिन्द लखनवी
इश्क़ कुछ आप पे मौक़ूफ़ नहीं ख़ुश रहिए
रिन्द लखनवी
इमसाल फ़स्ल-ए-गुल में वो फिर चाक हो गए
रिन्द लखनवी
हूर पर आँख न डाले कभी शैदा तेरा
रिन्द लखनवी
हम जो कहते हैं सरासर है ग़लत
रिन्द लखनवी
हों वो काफ़िर कि मुसलामानों ने अक्सर मुझ को
रिन्द लखनवी
हिज्र की शब हाथ में ले कर चराग़-ए-माहताब
रिन्द लखनवी
दीवानों से कह दो कि चली बाद-ए-बहारी
रिन्द लखनवी
दीद-ए-लैला के लिए दीदा-ए-मजनूँ है ज़रूर
रिन्द लखनवी
चाँदनी रातों में चिल्लाता फिरा
रिन्द लखनवी
बुत करें आरज़ू ख़ुदाई की
रिन्द लखनवी
बस अब आप तशरीफ़ ले जाइए
रिन्द लखनवी
बरहना देख कर आशिक़ में जान-ए-ताज़ा आती है
रिन्द लखनवी
अपने मरने का अगर रंज मुझे है तो ये है
रिन्द लखनवी
ऐ शब-ए-फ़ुर्क़त न कर मुझ पर अज़ाब
रिन्द लखनवी
ऐ परी हुस्न तिरा रौनक़-ए-हिंदुस्ताँ है
रिन्द लखनवी
ऐ जुनूँ तू ही छुड़ाए तो छुटूँ इस क़ैद से
रिन्द लखनवी
अगरी का है गुमाँ शक है मलागीरी का
रिन्द लखनवी
आँख से क़त्ल करे लब से जलाए मुर्दे
रिन्द लखनवी
आलम-पसंद हो गई जो बात तुम ने की
रिन्द लखनवी
आदमी पहचाना जाता है क़याफ़ा देख कर
रिन्द लखनवी
आ अंदलीब मिल के करें आह-ओ-ज़ारियाँ
रिन्द लखनवी