Couplets Poetry (page 174)
अच्छी पी ली ख़राब पी ली
रियाज़ ख़ैराबादी
अब मुजरिमान-ए-इश्क़ से बाक़ी हूँ एक मैं
रियाज़ ख़ैराबादी
आलम-ए-हू में कुछ आवाज़ सी आ जाती है
रियाज़ ख़ैराबादी
आगे कुछ बढ़ कर मिलेगी मस्जिद-ए-जामे 'रियाज़'
रियाज़ ख़ैराबादी
आफ़त हमारी जान को है बे-क़रार दिल
रियाज़ ख़ैराबादी
आबाद करें बादा-कश अल्लाह का घर आज
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़ुल्फ़ों की तरह उम्र बसर हो गई अपनी
रिन्द लखनवी
वादे पे तुम न आए तो कुछ हम न मर गए
रिन्द लखनवी
उदास देख के मुझ को चमन दिखाता है
रिन्द लखनवी
टूटे बुत मस्जिद बनी मिस्मार बुत-ख़ाना हुआ
रिन्द लखनवी
था मुक़द्दम इश्क़-ए-बुत इस्लाम पर तिफ़्ली में भी
रिन्द लखनवी
तबीअ'त को होगा क़लक़ चंद रोज़
रिन्द लखनवी
शौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-दीदार में तेरे हमदम
रिन्द लखनवी
रुतबा-ए-कुफ़्र है किस बात में कम ईमाँ से
रिन्द लखनवी
रिंदान-ए-इश्क़ छुट गए मज़हब की क़ैद से
रिन्द लखनवी
रास्ता रोक के कह लूँगा जो कहना है मुझे
रिन्द लखनवी
क़ैस समझा मिरी लैला की सवारी आई
रिन्द लखनवी
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स है वही सय्याद का घर
रिन्द लखनवी
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स है वही सय्याद का घर
रिन्द लखनवी
फेर लाता है ख़त-ए-शौक़ मिरा हो के तबाह
रिन्द लखनवी
पास-ए-दीं कुफ़्र में भी था मलहूज़
रिन्द लखनवी
परों को खोल दे ज़ालिम जो बंद करता है
रिन्द लखनवी
पाँव के हाथ से गर्दिश ही रही मुझ को मुदाम
रिन्द लखनवी
नाज़-ए-बेजा उठाइए किस से
रिन्द लखनवी
मुज़्दा-बाद ऐ बादा-ख़्वारो दौर-ए-वाइज़ हो चुका
रिन्द लखनवी
मज़ा पड़ा है क़नाअत का अहद-ए-तिफ़्ली से
रिन्द लखनवी
मौत आ जाए क़ैद में सय्याद
रिन्द लखनवी
मय-कश हूँ वो कि पूछता हूँ उठ के हश्र में
रिन्द लखनवी
मय पिला ऐसी कि साक़ी न रहे होश मुझे
रिन्द लखनवी
लैला मजनूँ का रटती है नाम
रिन्द लखनवी