Couplets Poetry (page 170)
गुमाँ किस पर करें सूफ़ी इधर है उस तरफ़ वाइज़
साइल देहलवी
आह करता हूँ तो आते हैं पसीने उन को
साइल देहलवी
तुम ने कैसा ये राब्ता रक्खा
सादुल्लाह शाह
तू रुके या न रुके फ़ैसला तुझ पर छोड़ा
सादुल्लाह शाह
तू न रुस्वा हो इस लिए हम ने
सादुल्लाह शाह
मुझ सा कोई जहान में नादान भी न हो
सादुल्लाह शाह
अपनी सोचें सफ़र में रहती हैं
सादुल्लाह शाह
ऐसे लगता है कि कमज़ोर बहुत है तू भी
सादुल्लाह शाह
आँखों से वो कभी मिरी ओझल नहीं रहा
सअादत सईद
मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है
एस ए मेहदी
जिंस-ए-वफ़ा का दहर में बाज़ार गिर गया
एस ए मेहदी
इन में क्या फ़र्क़ है अब इस का भी एहसास नहीं
एस ए मेहदी
दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल
एस ए मेहदी
दिल सदा तड़पे है मेरा मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह
राय सरब सुख दिवाना
वो तवज्जोह दे न दे लेकिन सदा देते रहो
रूही कंजाही
अब आप आ गए हैं तो आता नहीं है याद
रूही कंजाही
ज़मीन फैल गई है हमारी रूह तलक
रियाज़ लतीफ़
यहीं पर ख़त्म होनी चाहिए थी एक दुनिया
रियाज़ लतीफ़
किसी ने हम को अता नहीं की हमारी गर्दिश है अपनी गर्दिश
रियाज़ लतीफ़
ख़ुदा की ख़मोशी में शायद हो उस का वजूद
रियाज़ लतीफ़
कभी तो मंज़रों के इस तिलिस्म से उभर सकूँ
रियाज़ लतीफ़
बस लहू की बूँद थी एहसास में
रियाज़ लतीफ़
बाद में रखे सराबों के दयारों में क़दम
रियाज़ लतीफ़
ज़ेर-ए-मस्जिद मय-कदा में मय-कदे में मस्त-ए-ख़्वाब
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़र्फ़-ए-वज़ू है जाम है इक ख़म है इक सुबू
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़रा जो हम ने उन्हें आज मेहरबाँ देखा
रियाज़ ख़ैराबादी
ये सुन के आज हश्र में वो बात भी तो हो
रियाज़ ख़ैराबादी
ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की
रियाज़ ख़ैराबादी
ये क़ैस-ओ-कोहकन के से फ़साने बन गए कितने
रियाज़ ख़ैराबादी
ये मय-कदा है कि मस्जिद ये आब है कि शराब
रियाज़ ख़ैराबादी