Couplets Poetry (page 169)

हवस-परस्त अदीबों पे हद लगे कोई

सबा अकबराबादी

ग़म-ए-दौराँ को बड़ी चीज़ समझ रक्खा था

सबा अकबराबादी

ग़लत-फ़हमियों में जवानी गुज़ारी

सबा अकबराबादी

गए थे नक़्द-ए-गिराँ-माया-ए-ख़ुलूस के साथ

सबा अकबराबादी

इक रोज़ छीन लेगी हमीं से ज़मीं हमें

सबा अकबराबादी

दोस्तों से ये कहूँ क्या कि मिरी क़द्र करो

सबा अकबराबादी

भीड़ तन्हाइयों का मेला है

सबा अकबराबादी

बाल-ओ-पर की जुम्बिशों को काम में लाते रहो

सबा अकबराबादी

अज़ल से आज तक सज्दे किए और ये नहीं सोचा

सबा अकबराबादी

अपने जलने में किसी को नहीं करते हैं शरीक

सबा अकबराबादी

ऐसा भी कोई ग़म है जो तुम से नहीं पाया

सबा अकबराबादी

अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े

सबा अकबराबादी

अभी तो एक वतन छोड़ कर ही निकले हैं

सबा अकबराबादी

आप के लब पे और वफ़ा की क़सम

सबा अकबराबादी

आप आए हैं सो अब घर में उजाला है बहुत

सबा अकबराबादी

आईना कैसा था वो शाम-ए-शकेबाई का

सबा अकबराबादी

करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू

सबा अफ़ग़ानी

जो आ के रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है

सबा अफ़ग़ानी

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है

सबा अफ़ग़ानी

ये मस्जिद है ये मय-ख़ाना तअ'ज्जुब इस पर आता है

साइल देहलवी

तुम्हें परवा न हो मुझ को तो जिंस-ए-दिल की परवा है

साइल देहलवी

तुम आओ मर्ग-ए-शादी है न आओ मर्ग-ए-नाकामी

साइल देहलवी

मोहतसिब तस्बीह के दानों पे ये गिनता रहा

साइल देहलवी

मालूम नहीं किस से कहानी मिरी सुन ली

साइल देहलवी

खिल गई शम्अ तिरी सारी करामात-ए-जमाल

साइल देहलवी

ख़त-ए-शौक़ को पढ़ के क़ासिद से बोले

साइल देहलवी

झड़ी ऐसी लगा दी है मिरे अश्कों की बारिश ने

साइल देहलवी

जनाब-ए-शैख़ मय-ख़ाने में बैठे हैं बरहना-सर

साइल देहलवी

हमेशा ख़ून-ए-दिल रोया हूँ मैं लेकिन सलीक़े से

साइल देहलवी

हैं ए'तिबार से कितने गिरे हुए देखा

साइल देहलवी