Couplets Poetry (page 168)
हम उस की ख़ातिर बचा न पाएँगे उम्र अपनी
साबिर
हँस हँस के उस से बातें किए जा रहे हो तुम
साबिर
फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी
साबिर
चिलचिलाती-धूप थी लेकिन था साया हम-क़दम
साबिर
आफ़रीं लुत्फ़-ए-कलाम-ए-यार पर
साबिर
सजा कर चार-सू रंगीं महल तेरे ख़यालों के
सबिहा सबा, न्यूयार्क
कोई मसरूफ़ियत होगी वगर्ना मस्लहत होगी
सबिहा सबा, न्यूयार्क
तुझ से दूरी और क़यामत लगती है
सबा नुसरत
क्या ज़िक्र कि इस ज़ीस्त में कुछ खोया कि पाया
सबा नुसरत
छुप जाएँ कहीं आ कि बहुत तेज़ है बारिश
सबा इकराम
मैं बाज़गश्त-ए-दिल हूँ पैहम शिकस्त-ए-दिल हूँ
सबा अख़्तर
ये हमीं हैं कि तिरा दर्द छुपा कर दिल में
सबा अकबराबादी
टुकड़े हुए थे दामन-ए-हस्ती के जिस क़दर
सबा अकबराबादी
सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके
सबा अकबराबादी
समझेगा आदमी को वहाँ कौन आदमी
सबा अकबराबादी
रवाँ है क़ाफ़िला-ए-रूह-ए-इलतिफ़ात अभी
सबा अकबराबादी
रौशनी ख़ुद भी चराग़ों से अलग रहती है
सबा अकबराबादी
पस्ती ने बुलंदी को बनाया है हक़ीक़त
सबा अकबराबादी
मुसाफ़िरान-ए-रह-ए-शौक़ सुस्त-गाम हो क्यूँ
सबा अकबराबादी
क्या मआल-ए-दहर है मेरी मोहब्बत का मआल
सबा अकबराबादी
कुफ़्र ओ इस्लाम के झगड़े को चुका दो साहब
सबा अकबराबादी
ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया
सबा अकबराबादी
कौन उठाए इश्क़ के अंजाम की जानिब नज़र
सबा अकबराबादी
कमाल-ए-ज़ब्त में यूँ अश्क-ए-मुज़्तर टूट कर निकला
सबा अकबराबादी
कब तक यक़ीन इश्क़ हमें ख़ुद न आएगा
सबा अकबराबादी
कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम
सबा अकबराबादी
काम आएगी मिज़ाज-ए-इश्क़ की आशुफ़्तगी
सबा अकबराबादी
जब इश्क़ था तो दिल का उजाला था दहर में
सबा अकबराबादी
इश्क़ आता न अगर राह-नुमाई के लिए
सबा अकबराबादी
इस शान का आशुफ़्ता-ओ-हैराँ न मिलेगा
सबा अकबराबादी