Couplets Poetry (page 166)

शायरी फूल खिलाने के सिवा कुछ भी नहीं है तो 'ज़फ़र'

साबिर ज़फ़र

सर-ए-शाम लुट चुका हूँ सर-ए-आम लुट चुका हूँ

साबिर ज़फ़र

पहले भी ख़ुदा को मानता था

साबिर ज़फ़र

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम

साबिर ज़फ़र

नामा-बर कोई नहीं है तो किसी लहर के हाथ

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

न इंतिज़ार करो इन का ऐ अज़ा-दारो

साबिर ज़फ़र

मुड़ के जो आ नहीं पाया होगा उस कूचे में जा के 'ज़फ़र'

साबिर ज़फ़र

मिलूँ तो कैसे मिलूँ बे-तलब किसी से मैं

साबिर ज़फ़र

मैं ने घाटे का भी इक सौदा किया

साबिर ज़फ़र

मैं सोचता हूँ मुझे इंतिज़ार किस का है

साबिर ज़फ़र

मैं ऐसे जमघटे में खो गया हूँ

साबिर ज़फ़र

कुछ बे-ठिकाना करती रहीं हिजरतें मुदाम

साबिर ज़फ़र

कितनी बे-सूद जुदाई है कि दुख भी न मिला

साबिर ज़फ़र

किसी ज़िंदाँ में सोचना है अबस

साबिर ज़फ़र

किसी ख़याल की सरशारी में जारी-ओ-सारी यारी में

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

साबिर ज़फ़र

कैसे करें बंदगी 'ज़फ़र' वाँ

साबिर ज़फ़र

कहती है ये शाम की नर्म हवा फिर महकेगी इस घर की फ़ज़ा

साबिर ज़फ़र

इलाज-ए-अहल-ए-सितम चाहिए अभी से 'ज़फ़र'

साबिर ज़फ़र

इक-आध बार तो जाँ वारनी ही पड़ती है

साबिर ज़फ़र

हम इतना चाहते थे एक दूसरे को 'ज़फ़र'

साबिर ज़फ़र

हर शख़्स बिछड़ चुका है मुझ से

साबिर ज़फ़र

हर दर्जे पे इश्क़ कर के देखा

साबिर ज़फ़र

गुज़ारता हूँ जो शब इश्क़-ए-बे-मआश के साथ

साबिर ज़फ़र

दूर तक एक ख़ला है सो ख़ला के अंदर

साबिर ज़फ़र

बेवफ़ा लोगों में रहना तिरी क़िस्मत ही सही

साबिर ज़फ़र

बना हुआ है मिरा शहर क़त्ल-गाह कोई

साबिर ज़फ़र

बदन ने छोड़ दिया रूह ने रिहा न किया

साबिर ज़फ़र

अपनी यादें उस से वापस माँग कर

साबिर ज़फ़र