Couplets Poetry (page 165)

रस्म-ए-दुनिया तो किसी तौर निभाते जाओ

सदा अम्बालवी

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

मोहब्बत के मरीज़ों का मुदावा है ज़रा मुश्किल

सदा अम्बालवी

लोग कहते हैं दिल लगाना जिसे

सदा अम्बालवी

क्यूँ सदा पहने वो तेरा ही पसंदीदा लिबास

सदा अम्बालवी

कौन आएगा भूल कर रस्ता

सदा अम्बालवी

हमें न रास ज़माने की महफ़िलें आई

सदा अम्बालवी

इक न इक रोज़ रिफ़ाक़त में बदल जाएगी

सदा अम्बालवी

दिल को समझा लें अभी से तो मुनासिब होगा

सदा अम्बालवी

दिल जलाओ या दिए आँखों के दरवाज़े पर

सदा अम्बालवी

दे गया ख़ूब सज़ा मुझ को कोई कर के मुआफ़

सदा अम्बालवी

चलो कि हम भी ज़माने के साथ चलते हैं

सदा अम्बालवी

बड़ा घाटे का सौदा है 'सदा' ये साँस लेना भी

सदा अम्बालवी

अपनी उर्दू तो मोहब्बत की ज़बाँ थी प्यारे

सदा अम्बालवी

अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले

सदा अम्बालवी

'ज़फ़र' वहाँ कि जहाँ हो कोई भी हद क़ाएम

साबिर ज़फ़र

'ज़फ़र' है बेहतरी इस में कि मैं ख़मोश रहूँ

साबिर ज़फ़र

ये ज़ख़्म-ए-इश्क़ है कोशिश करो हरा ही रहे

साबिर ज़फ़र

ये इब्तिदा थी कि मैं ने उसे पुकारा था

साबिर ज़फ़र

यहाँ है धूप वहाँ साए हैं चले जाओ

साबिर ज़फ़र

वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं

साबिर ज़फ़र

वो क्यूँ न रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी

साबिर ज़फ़र

वो जाग रहा हो शायद अब तक

साबिर ज़फ़र

वो एक बार भी मुझ से नज़र मिलाए अगर

साबिर ज़फ़र

उस से बिछड़ के एक उसी का हाल नहीं मैं जान सका

साबिर ज़फ़र

उम्र भर लिखते रहे फिर भी वरक़ सादा रहा

साबिर ज़फ़र

तुम्हें तो क़ब्र की मिट्टी भी अब पुकारती है

साबिर ज़फ़र

सुब्ह की सैर की करता हूँ तमन्ना शब भर

साबिर ज़फ़र

शिकायत उस से नहीं अपने-आप से है मुझे

साबिर ज़फ़र

शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा

साबिर ज़फ़र