Couplets Poetry (page 167)

अजब इक बे-यक़ीनी की फ़ज़ा है

साबिर ज़फ़र

ऐ काश ख़ुद सुकूत भी मुझ से हो हम-कलाम

साबिर ज़फ़र

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

साबिर वसीम

पहला पत्थर याद हमेशा रहता है

साबिर वसीम

ख़्वाब तुम्हारे आते हैं

साबिर वसीम

तअल्लुक़ तुम से जो भी है नहीं मालूम कल क्या हो

साबिर रज़ा

ज़ुल्फ़ की शाम सुब्ह चेहरे की

साबिर दत्त

ये कैसी सियासत है मिरे मुल्क पे हावी

साबिर दत्त

रुख़ उन का कहीं और नज़र और तरफ़ है

साबिर दत्त

फिर लाई है बरसात तिरी याद का मौसम

साबिर दत्त

मुद्दतों बाद उठाए थे पुराने काग़ज़

साबिर दत्त

लोग करते हैं ख़्वाब की बातें

साबिर दत्त

ख़्वाबों से न जाओ कि अभी रात बहुत है

साबिर दत्त

जी भर के तुम्हें देख लूँ तस्कीन हो कुछ तो

साबिर दत्त

यूँ तो मिलने को लोग मिलते हैं

साबिर बद्र जाफ़री

जान भी साथ छोड़ देती है

साबिर बद्र जाफ़री

दुश्मनी पेड़ पर नहीं उगती

साबिर बद्र जाफ़री

तिलिस्म टूट गया शब का मैं भी घर को चलूँ

साबिर अदीब

मैं अकेला हूँ तू भी तन्हा है

साबिर अदीब

इस क़दर ऊँची हुई दीवार-ए-नफ़रत हर तरफ़

साबिर अदीब

ये क्या बद-मज़ाक़ी है गर्द झाड़ते क्यूँ हो

साबिर

ये कारोबार-ए-मोहब्बत है तुम न समझोगे

साबिर

यहाँ पे हँसना रवा है रोना है बे-हयाई

साबिर

उस के शर से मैं सदा माँगता रहता हूँ पनाह

साबिर

तिरे तसव्वुर की धूप ओढ़े खड़ा हूँ छत पर

साबिर

सारे मंज़र हसीन लगते हैं

साबिर

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

सभी मुसाफ़िर चलें अगर एक रुख़ तो क्या है मज़ा सफ़र का

साबिर

रखे रखे हो गए पुराने तमाम रिश्ते

साबिर

मुझ से कल महफ़िल में उस ने मुस्कुरा कर बात की

साबिर