Couplets Poetry (page 189)
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
राहत इंदौरी
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
राहत इंदौरी
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
राहत इंदौरी
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
राहत इंदौरी
ख़ुदा कातिब की सफ़्फ़ाकी से भी महफ़ूज़ फ़रमाए
राग़िब मुरादाबादी
जिसे कहते हो तुम इक क़तरा-ए-अश्क
राग़िब मुरादाबादी
हक़ीक़त को छुपाया हम से क्या क्या उस के मेक-अप ने
राग़िब मुरादाबादी
तुम समुंदर के सहमे हुए जोश को मेरा पैग़ाम देना
रफ़ीक़ ख़याल
तफ़्सील-ए-इनायात तो अब याद नहीं है
रफ़ीक़ ख़याल
बात तो जब है कि जज़्बों से सदाक़त फूटे
रफ़ीक़ ख़याल
सूरज की तरह मौत मिरे सर पे रहेगी
रफ़ीक़ संदेलवी
डूब जाएँ न फूल की नब्ज़ें
रफ़ीक़ संदेलवी
तू मेरे सज्दों की लाज रख ले शुऊर-ए-सज्दा नहीं है मुझ को
रफ़ीक राज़
रूह में जिस ने ये दहशत सी मचा रक्खी है
रफ़ीक राज़
तू ख़ुद अपनी मिसाल है वो तो है
रफ़ी रज़ा
पड़ा हुआ हूँ मैं सज्दे में कह नहीं पाता
रफ़ी रज़ा
मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी
रफ़ी रज़ा
किस ने रोका है सर-ए-राह-ए-मोहब्बत तुम को
रफ़ी रज़ा
एक उजड़ी हुई हसरत है कि पागल हो कर
रफ़ी रज़ा
एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है
रफ़ी रज़ा
एक दिन अपना सहीफ़ा मुझ पे नाज़िल हो गया
रफ़ी रज़ा
धूप छाँव का कोई खेल है बीनाई भी
रफ़ी रज़ा
आईने को तोड़ा है तो मालूम हुआ है
रफ़ी रज़ा
वरक़ वरक़ तुझे तहरीर करता रहता हूँ
रईसुदीन रईस
तुम ने हँसते मुझे देखा है तुम्हें क्या मालूम
रईस रामपुरी
वो सामने सर-ए-मंज़िल चराग़ जलते हैं
राज़ यज़दानी
ठहर के तलवों से काँटे निकालने वाले
राज़ यज़दानी
ठहर के पाँव के काटे निकालने वाले
राज़ यज़दानी
सज़ा के झेलने वाले ये सोचना है गुनाह
राज़ यज़दानी
अगर गुनाह के क़िस्से भी कह दिए तुझ से
राज़ यज़दानी