Couplets Poetry (page 190)
रंग-ओ-बू के पर्दे में कौन ये ख़िरामाँ है
राज़ मुरादाबादी
किसी के वादा-ए-सब्र-आज़मा की ख़ैर कि हम
राज़ मुरादाबादी
हर इक शिकस्त-ए-तमन्ना पे मुस्कुराते हैं
राज़ मुरादाबादी
ये मेरी तमन्ना है प्यासों के मैं काम आऊँ
राज़ इलाहाबादी
उम्र जूँ जूँ बढ़ती है दिल जवान होता है
राज़ इलाहाबादी
अश्क-ए-ग़म ले के आख़िर किधर जाएँ हम आँसुओं की यहाँ कोई क़ीमत नहीं
राज़ इलाहाबादी
आशियाँ जल गया गुल्सिताँ लुट गया हम क़फ़स से निकल कर किधर जाएँगे
राज़ इलाहाबादी
पी शराब नाम-ए-रिंदाँ ता असर सूँ कैफ़ के
क़ुर्बी वेलोरी
'क़ुतुब' शह न दे मुज दिवाने को पंद
क़ुली क़ुतुब शाह
पिया की याद सूँ पीता हूँ मैं मय
क़ुली क़ुतुब शाह
पिया बाज प्याला पिया जाए ना
क़ुली क़ुतुब शाह
नबी सदक़े कुतुब शह दिल में कीता
क़ुली क़ुतुब शाह
मोहब्बत की सुल्तानी है सब जगत में
क़ुली क़ुतुब शाह
मैं न जानूँ काबा-ओ-बुत-ख़ाना-ओ-मय-ख़ाना कूँ
क़ुली क़ुतुब शाह
करें ताक़त गँवा कर आबिदाँ मय-ख़ाना कूँ सज्दा
क़ुली क़ुतुब शाह
उम्र भर खुल नहीं पाते हैं रुमूज़-ओ-असरार
क़ैसर ख़ालिद
तेरे बिन हयात की सोच भी गुनाह थी
क़ैसर ख़ालिद
मोहमल है न जानें तो, समझें तो वज़ाहत है
क़ैसर ख़ालिद
कुछ तू ही बता आख़िर क्यूँ-कर तिरे बंदों पर
क़ैसर ख़ालिद
हो पाए किसी के हम भी कहाँ यूँ कोई हमारा भी न हुआ
क़ैसर ख़ालिद
डाल दी पैरों में उस शख़्स के ज़ंजीर यहाँ
क़ैसर ख़ालिद
बातों से फूल झड़ते थे लेकिन ख़बर न थी
क़ैसर ख़ालिद
अब इस तरह भी रिवायत से इंहिराफ़ न कर
क़ैसर ख़ालिद
आतिश-ए-इश्क़ से बचिए कि यहाँ हम ने भी
क़ैसर ख़ालिद
यक नुक्ता नुक्ता-दाँ कूँ है काफ़ी शनास का
क़ाज़ी महमूद बेहरी
बर-अक्स क्यूँ हुआ है ज़माने के फेर में
क़ाज़ी महमूद बेहरी
याद आया भी तो यूँ अहद-ए-वफ़ा
क़य्यूम नज़र
तेरी निगह से तुझ को ख़बर है कि क्या हुआ
क़य्यूम नज़र
पूछो तो एक एक है तन्हा सुलग रहा
क़य्यूम नज़र
नक़्श-ए-कफ़-ए-पा ने गुल खिलाए
क़य्यूम नज़र