Couplets Poetry (page 223)
लिपटा के शब-ए-वस्ल वो उस शोख़ का कहना
निज़ाम रामपुरी
क्या किसी से किसी का हाल कहें
निज़ाम रामपुरी
क्या दुआ रोज़-ए-हश्र की माँगें
निज़ाम रामपुरी
कू-ए-जानाँ में गर अब जाएँ भी तो क्या देखें
निज़ाम रामपुरी
किस क़दर हिज्र में बेहोशी है
निज़ाम रामपुरी
किस का है इंतिज़ार कहाँ ध्यान है लगा
निज़ाम रामपुरी
ख़ुश्बू वो पसीने की तिरी याद न आ जाए
निज़ाम रामपुरी
कहीं उस बज़्म तक रसाई हो
निज़ाम रामपुरी
जो कुछ इशारे होते हैं सब देखता हूँ मैं
निज़ाम रामपुरी
जो कि नादाँ है वो क्या जाने तिरी चाहत की क़द्र
निज़ाम रामपुरी
जो जो मज़े किए हैं ज़बाँ से मैं क्या कहूँ
निज़ाम रामपुरी
इस क़दर आप का इताब रहे
निज़ाम रामपुरी
हुए नुमूद जो पिस्ताँ तो शर्म खा के कहा
निज़ाम रामपुरी
हक़ बात तो ये है कि उसी बुत के वास्ते
निज़ाम रामपुरी
है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम
निज़ाम रामपुरी
गर कोई पूछे मुझे आप इसे जानते हैं
निज़ाम रामपुरी
इक वो कि रात दिन रहें महफ़िल में उस की हाए
निज़ाम रामपुरी
इक बात लिखी है क्या ही मैं ने
निज़ाम रामपुरी
दुश्मन से और होतीं बहुत बातें प्यार की
निज़ाम रामपुरी
दो दिन भी उस सनम से न अपनी निभी कभी
निज़ाम रामपुरी
देना वो उस का साग़र-ए-मय याद है 'निज़ाम'
निज़ाम रामपुरी
देख कर ग़ैर को शोख़ी देखो
निज़ाम रामपुरी
दरबाँ से आप कहते थे कुछ मेरे बाब में
निज़ाम रामपुरी
छेड़ हर वक़्त की नहीं जाती
निज़ाम रामपुरी
बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है
निज़ाम रामपुरी
बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गईं
निज़ाम रामपुरी
बहर-ए-हस्ती से कूच है दरपेश
निज़ाम रामपुरी
अपनी अंदाज़ के कह शेर न कह ये तू 'निज़ाम'
निज़ाम रामपुरी
अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
अंदाज़ अपना देखते हैं आईने में वो
निज़ाम रामपुरी