Couplets Poetry (page 224)
अभी तो कहा ही नहीं मैं ने कुछ
निज़ाम रामपुरी
अब तुम से क्या किसी से शिकायत नहीं मुझे
निज़ाम रामपुरी
अब तो सब का तिरे कूचे ही में मस्कन ठहरा
निज़ाम रामपुरी
अब क्या मिलें किसी से कहाँ जाएँ अब 'निज़ाम'
निज़ाम रामपुरी
अब किस को याँ बुलाएँ किस की तलब करें हम
निज़ाम रामपुरी
अब आओ मिल के सो रहें तकरार हो चुकी
निज़ाम रामपुरी
आप देखें तो मिरे दिल में भी क्या क्या कुछ है
निज़ाम रामपुरी
आँखें फूटें जो झपकती भी हों
निज़ाम रामपुरी
आए भी वो चले भी गए याँ किसे ख़बर
निज़ाम रामपुरी
तुम तो ठुकरा कर गुज़र जाओ तुम्हें टोकेगा कौन
नियाज़ फ़तेहपुरी
न दुनिया का हूँ मैं न कुछ फ़िक्र दीं का
नियाज़ फ़तेहपुरी
मैं अब तो ऐ जुनूँ तिरे हाथों से तंग हूँ
नियाज़ फ़तेहपुरी
घड़ी घड़ी न इधर देखिए कि दिल पे मुझे
नियाज़ फ़तेहपुरी
रात अब अपने इख़्तिताम पे है
निशांत श्रीवास्तव नायाब
मैं एक पल में अँधेरे से हार जाऊँगा
निशांत श्रीवास्तव नायाब
जुनूँ को ढाल बनाया तो बच गए वर्ना
निशांत श्रीवास्तव नायाब
हिफ़ाज़त हर किसी की वो बड़ी ख़ूबी से करता है
निशांत श्रीवास्तव नायाब
एक भी पत्थर न आया राह में
निशांत श्रीवास्तव नायाब
चूड़ियाँ क्यूँ उतार दीं तुम ने
निशांत श्रीवास्तव नायाब
ब-ज़ाहिर दश्त की जानिब तो बढ़ता जा रहा है
निशांत श्रीवास्तव नायाब
जाने किस वक़्त कूच करना हो
निकहत इफ़्तिख़ार
हज़ार रंग-ब-दामाँ सही मगर दुनिया
निकहत बरेलवी
तुम जो आए हो तो शक्ल-ए-दर-ओ-दीवार है और
निहाल सेवहारवी
ज़रूरी क्या हर इक महफ़िल में बैठें
निदा फ़ाज़ली
ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई
निदा फ़ाज़ली
ये काटे से नहीं कटते ये बाँटे से नहीं बटते
निदा फ़ाज़ली
यक़ीन चाँद पे सूरज में ए'तिबार भी रख
निदा फ़ाज़ली
यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
निदा फ़ाज़ली
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
निदा फ़ाज़ली
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में
निदा फ़ाज़ली