Couplets Poetry (page 225)

उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था

निदा फ़ाज़ली

उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा

निदा फ़ाज़ली

तुम से छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था

निदा फ़ाज़ली

सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा

निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

निदा फ़ाज़ली

सब कुछ तो है क्या ढूँडती रहती हैं निगाहें

निदा फ़ाज़ली

रिश्तों का ए'तिबार वफ़ाओं का इंतिज़ार

निदा फ़ाज़ली

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

निदा फ़ाज़ली

नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढिए

निदा फ़ाज़ली

मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं

निदा फ़ाज़ली

मुमकिन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चल कर देखें

निदा फ़ाज़ली

मेरी ग़ुर्बत को शराफ़त का अभी नाम न दे

निदा फ़ाज़ली

मिरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है

निदा फ़ाज़ली

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई

निदा फ़ाज़ली

कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन

निदा फ़ाज़ली

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है

निदा फ़ाज़ली

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं

निदा फ़ाज़ली

किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से

निदा फ़ाज़ली

ख़ुश-हाल घर शरीफ़ तबीअत सभी का दोस्त

निदा फ़ाज़ली

ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को

निदा फ़ाज़ली

ख़तरे के निशानात अभी दूर हैं लेकिन

निदा फ़ाज़ली

कहता है कोई कुछ तो समझता है कोई कुछ

निदा फ़ाज़ली

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

निदा फ़ाज़ली

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया

निदा फ़ाज़ली

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे

निदा फ़ाज़ली

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी

निदा फ़ाज़ली

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

निदा फ़ाज़ली

हम भी किसी कमान से निकले थे तीर से

निदा फ़ाज़ली

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

निदा फ़ाज़ली

हर जंगल की एक कहानी वो ही भेंट वही क़ुर्बानी

निदा फ़ाज़ली