Couplets Poetry (page 222)
बड़े घरों में रही है बहुत ज़माने तक
नोमान शौक़
बदन ने कितनी बढ़ा ली है सल्तनत अपनी
नोमान शौक़
और मत देखिए अब अद्ल-ए-जहाँगीर के ख़्वाब
नोमान शौक़
अपनी आहट पे चौंकता हूँ मैं
नोमान शौक़
ऐसी ही एक शब में किसी से मिला था दिल
नोमान शौक़
अब इसे ग़र्क़ाब करने का हुनर भी सीख लूँ
नोमान शौक़
आसमानों से ज़मीं की तरफ़ आते हुए हम
नोमान शौक़
आँख खुल जाए तो घर मातम-कदा बन जाएगा
नोमान शौक़
आइने का सामना अच्छा नहीं है बार बार
नोमान शौक़
ज़िद है गर है तो हो सभी के साथ
निज़ाम रामपुरी
यूँ तो रूठे हैं मगर लोगों से
निज़ाम रामपुरी
ये हवा सर्द चली और ये बादल आए
निज़ाम रामपुरी
ये दिन तो सर्फ़ आप के वादों में हो गए
निज़ाम रामपुरी
ये भी नया सितम है हिना तो लगाएँ ग़ैर
निज़ाम रामपुरी
वो इशारों में उस का कहना हाए
निज़ाम रामपुरी
उठता हूँ उस की बज़्म से जब हो के ना-उमीद
निज़ाम रामपुरी
उस की उल्फ़त में जीते-जी मरना
निज़ाम रामपुरी
तुम हो गए कुछ और न कुछ और हम हुए
निज़ाम रामपुरी
तुझ से ही छुपाऊँगा ग़म अपना
निज़ाम रामपुरी
तेरे ही ग़म में मर गए सद-शुक्र
निज़ाम रामपुरी
तेरा मिलना तो है मुश्किल मगर इतना तो हुआ
निज़ाम रामपुरी
सच है 'निज़ाम' याद भी उस को न होंगे हम
निज़ाम रामपुरी
राह निकलेगी न कब तक कोई
निज़ाम रामपुरी
रात था वस्ल आज हिज्र का दिन
निज़ाम रामपुरी
न बन आया जब उन को कोई जवाब
निज़ाम रामपुरी
मुंतज़िर हूँ किसी के आने का
निज़ाम रामपुरी
मेरे मिलने से जो यूँ हाथ उठा-बैठा तू
निज़ाम रामपुरी
मज़मून सूझते हैं हज़ारों नए नए
निज़ाम रामपुरी
मंज़ूर क्या है ये भी तो खुलता नहीं सबब
निज़ाम रामपुरी
मैं न कहता था कि बहकाएँगे तुम को दुश्मन
निज़ाम रामपुरी