Couplets Poetry (page 198)

'क़मर' अफ़्शाँ चुनी है रुख़ पे उस ने इस सलीक़े से

क़मर जलालवी

पूछो न अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो

क़मर जलालवी

नज़'अ की और भी तकलीफ़ बढ़ा दी तुम ने

क़मर जलालवी

नशेमन ख़ाक होने से वो सदमा दिल को पहुँचा है

क़मर जलालवी

न हो रिहाई क़फ़स से अगर नहीं होती

क़मर जलालवी

मुझे मेरे मिटने का ग़म है तो ये है

क़मर जलालवी

मुद्दतें हुईं अब तो जल के आशियाँ अपना

क़मर जलालवी

मैं उन सब में इक इम्तियाज़ी निशाँ हूँ फ़लक पर नुमायाँ हैं जितने सितारे

क़मर जलालवी

ख़ून होता है सहर तक मिरे अरमानों का

क़मर जलालवी

कभी कहा न किसी से तिरे फ़साने को

क़मर जलालवी

जिगर का दाग़ छुपाओ 'क़मर' ख़ुदा के लिए

क़मर जलालवी

जल्वा-गर बज़्म-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से

क़मर जलालवी

इस लिए आरज़ू छुपाई है

क़मर जलालवी

हर वक़्त महवियत है यही सोचता हूँ मैं

क़मर जलालवी

दबा के क़ब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम

क़मर जलालवी

बढ़ा बढ़ा के जफ़ाएँ झुका ही दोगे कमर

क़मर जलालवी

ऐसे में वो हों बाग़ हो साक़ी हो ऐ 'क़मर'

क़मर जलालवी

अगर आ जाए पहलू में 'क़मर' वो माह-ए-कामिल भी

क़मर जलालवी

अभी बाक़ी हैं पत्तों पर जले तिनकों की तहरीरें

क़मर जलालवी

अब नज़अ का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो

क़मर जलालवी

अब आगे इस में तुम्हारा भी नाम आएगा

क़मर जलालवी

आएँ हैं वो मज़ार पे घूँघट उतार के

क़मर जलालवी

राह में उन से मुलाक़ात हो गई

क़मर जलालाबादी

रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए

क़मर जलालाबादी

मिरे ख़ुदा मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

क़मर जलालाबादी

कुछ तो है बात जो आती है क़ज़ा रुक रुक के

क़मर जलालाबादी

जाती हुई मय्यत देख के भी वल्लाह तुम उठ कर आ न सके

क़मर जलालाबादी

ज़िंदगी ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा अब तक

क़ैसर-उल जाफ़री

ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले

क़ैसर-उल जाफ़री

ये वक़्त बंद दरीचों पे लिख गया 'क़ैसर'

क़ैसर-उल जाफ़री