Couplets Poetry (page 196)
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
क़तील शिफ़ाई
ब-पास-ए-दिल जिसे अपने लबों से भी छुपाया था
क़तील शिफ़ाई
अपनी ज़बाँ तो बंद है तुम ख़ुद ही सोच लो
क़तील शिफ़ाई
अपने लिए अब एक ही राह नजात है
क़तील शिफ़ाई
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
क़तील शिफ़ाई
अहबाब को दे रहा हूँ धोका
क़तील शिफ़ाई
अच्छा यक़ीं नहीं है तो कश्ती डुबा के देख
क़तील शिफ़ाई
अभी तो बात करो हम से दोस्तों की तरह
क़तील शिफ़ाई
अब जिस के जी में आए वही पाए रौशनी
क़तील शिफ़ाई
आया ही था अभी मिरे लब पे वफ़ा का नाम
क़तील शिफ़ाई
आख़री हिचकी तिरे ज़ानूँ पे आए
क़तील शिफ़ाई
ये क्या कि बैठा है दरिया किनार-ए-दरिया पर
क़ासिम याक़ूब
ये झाँक लेती है अंदर से आरज़ू-ख़ाना
क़ासिम याक़ूब
क्या हो सके हिसाब कि जब आगही कहे
क़ासिम याक़ूब
दर-ए-इम्कान की दस्तक मुझे भेजी गई है
क़ासिम याक़ूब
सुबूत माँगते हैं वो मिरी वफ़ा का 'जलाल'
क़ासिम जलाल
यार का कूचा है मस्जूद-ए-ख़लाइक़ देख ले
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
शराब साक़ी-ए-कौसर से लीजो 'आफ़रीदी'
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
शैख़ मुझ को न डरा अपनी मुसलमानी थाम
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
नासेहा वा'ज़ जो कहता था तुझे बिन देखे
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
नर्गिसी चश्म दिखा कर के वो वहशत-ज़दा यार
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
मुझे ख़ुशी कि गिरफ़्तार मैं हुआ तेरा
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
मारा जावेगा भाग ऐ नासेह
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
लब-ए-शीरीं से अगर हो न तेरा लब शीरीं
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ख़ुदा को सज्दा कर के मुब्तज़िल ज़ाहिद हुआ अब तो
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
काम है मतलब से चाहे कुफ़्र होवे या कि दीं
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
इश्क़ है ऐ दिल कठिन कुछ ख़ाना-ए-ख़ाला नहीं
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
है जुदा सज्दा की जा हिन्दू मुसलमाँ की मगर
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
बस नहीं चलता है वर्ना अपने मर जाने के साथ
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
अजब तरह की है दुनिया ब-रंग-ए-बू-क़लमूँ
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी