Couplets Poetry (page 527)

हम ने हज़ार फ़ासले जी कर तमाम शब

अमीता परसुराम 'मीता'

दो किनारों को मिलाया था फ़क़त लहरों ने

अमीता परसुराम 'मीता'

उठ्ठे कहाँ बैठे कहाँ कब आए गए कब

अमीरुल इस्लाम हाशमी

मिरी मजबूरियों ने नाज़ुकी का ख़ून कर डाला

अमीरुल इस्लाम हाशमी

जब पढ़ा जौर ओ जफ़ा मैं ने तो आई ये सदा

अमीरुल इस्लाम हाशमी

ज़िंदगी की दौड़ में पीछे न था

अमीर क़ज़लबाश

ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता

अमीर क़ज़लबाश

यार क्या ज़िंदगी है सूरज की

अमीर क़ज़लबाश

यकुम जनवरी है नया साल है

अमीर क़ज़लबाश

वक़्त के साथ बदलना तो बहुत आसाँ था

अमीर क़ज़लबाश

उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़

अमीर क़ज़लबाश

उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी

अमीर क़ज़लबाश

तुम राह में चुप-चाप खड़े हो तो गए हो

अमीर क़ज़लबाश

सुना है अब भी मिरे हाथ की लकीरों में

अमीर क़ज़लबाश

सुब्ह तक मैं सोचता हूँ शाम से

अमीर क़ज़लबाश

क़त्ल हो तो मेरा सा मौत हो तो मेरी सी

अमीर क़ज़लबाश

पूछा है ग़ैर से मिरे हाल-ए-तबाह को

अमीर क़ज़लबाश

मुज़्तरिब हैं मौजें क्यूँ उठ रहे हैं तूफ़ाँ क्यूँ

अमीर क़ज़लबाश

मुझ से बच बच के चली है दुनिया

अमीर क़ज़लबाश

मिरे पड़ोस में ऐसे भी लोग बसते हैं

अमीर क़ज़लबाश

मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा

अमीर क़ज़लबाश

मिरे घर में तो कोई भी नहीं है

अमीर क़ज़लबाश

मैं ने क्यूँ तर्क-ए-तअल्लुक़ की जसारत की है

अमीर क़ज़लबाश

मैं क्या जानूँ घरों का हाल क्या है

अमीर क़ज़लबाश

लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं

अमीर क़ज़लबाश

क्या गुज़रती है मिरे बाद उस पर

अमीर क़ज़लबाश

कुछ तो अपनी ख़बर मिले मुझ को

अमीर क़ज़लबाश

ख़ाली हाथ निकल घर से

अमीर क़ज़लबाश

जश्न-ए-बहार-ए-नौ है नशेमन की ख़ैर हो

अमीर क़ज़लबाश

इतना बेदारियों से काम न लो

अमीर क़ज़लबाश