Couplets Poetry (page 37)

कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को

वसीम बरेलवी

कोई इशारा दिलासा न कोई व'अदा मगर

वसीम बरेलवी

किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर

वसीम बरेलवी

किसी को कैसे बताएँ ज़रूरतें अपनी

वसीम बरेलवी

जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है बरसों से

वसीम बरेलवी

जिस्म की चाह लकीरों से अदा करता है

वसीम बरेलवी

झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए

वसीम बरेलवी

झूट के आगे पीछे दरिया चलते हैं

वसीम बरेलवी

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

वसीम बरेलवी

इसी ख़याल से पलकों पे रुक गए आँसू

वसीम बरेलवी

इन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था कि मेरे थे

वसीम बरेलवी

हम ये तो नहीं कहते कि हम तुझ से बड़े हैं

वसीम बरेलवी

होंटों को रोज़ इक नए दरिया की आरज़ू

वसीम बरेलवी

हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल

वसीम बरेलवी

ग़म और होता सुन के गर आते न वो 'वसीम'

वसीम बरेलवी

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

वसीम बरेलवी

चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का

वसीम बरेलवी

भरे मकाँ का भी अपना नशा है क्या जाने

वसीम बरेलवी

बहुत से ख़्वाब देखोगे तो आँखें

वसीम बरेलवी

अपनी इस आदत पे ही इक रोज़ मारे जाएँगे

वसीम बरेलवी

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

वसीम बरेलवी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं

वसीम बरेलवी

आते आते मिरा नाम सा रह गया

वसीम बरेलवी

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है

वसीम बरेलवी

आज पी लेने दे जी लेने दे मुझ को साक़ी

वसीम बरेलवी

मुझ को दुनिया से बे-ख़बर कर दे

वसीम अकरम

कोई सूरत नहीं मगर उस का

वसीम अकरम

कैसे उस को दिल की हालत समझाऊँ

वसीम अकरम

देख उसे सब ज़िक्र हमारा करते हैं

वसीम अकरम

आज व'अदा वो फिर निभाएगा

वसीम अकरम