Couplets Poetry (page 35)
हल्की सी ख़लिश दिल में निगाहों में उदासी
वासिफ़ देहलवी
दीदार से पहले ही क्या हाल हुआ दिल का
वासिफ़ देहलवी
दामन के दाग़ अश्क-ए-नदामत ने धो दिए
वासिफ़ देहलवी
बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम
वासिफ़ देहलवी
भरम उस का ही ऐ मंसूर तू ने रख लिया होता
वासिफ़ देहलवी
बहुत अच्छा हुआ आँसू न निकले मेरी आँखों से
वासिफ़ देहलवी
आज रुख़्सत हो गया दुनिया से इक बीमार-ए-ग़म
वासिफ़ देहलवी
तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से
वसी शाह
मुझे ख़बर थी कि अब लौट कर न आऊँगा
वसी शाह
मुद्दतों उस की ख़्वाहिश से चलते रहे हाथ आता नहीं
वसी शाह
कौन कहता है मुलाक़ात मिरी आज की है
वसी शाह
जो तू नहीं है तो ये मुकम्मल न हो सकेंगी
वसी शाह
जैसे हो उम्र भर का असासा ग़रीब का
वसी शाह
इस जुदाई में तुम अंदर से बिखर जाओगे
वसी शाह
हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर
वसी शाह
हर इक मुफ़लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं
वसी शाह
हर एक मौसम में रौशनी सी बिखेरते हैं
वसी शाह
दिलों पे छाई है गर्द-ए-कुदूरत
वसीम मीनाई
शाख़ से कट कर अलग होने का हम को ग़म नहीं
वसीम मलिक
लुत्फ़ ये है कि उसी शख़्स के मम्नून हैं हम
वसीम मलिक
लगता है जुदा सब से किरदार 'वसीम' उस का
वसीम मलिक
कोई दस्तक कोई आहट न सदा है कोई
वसीम मलिक
कल साथ था कोई तो दर ओ बाम थे रौशन
वसीम मलिक
उसे बहिश्त के ज़िंदाँ में भेज देना तुम
वसीम ख़ैराबादी
जुर्म इतने कर चला हूँ हश्र तक लिक्खेंगे रोज़
वसीम ख़ैराबादी
फ़लक बेदाद करता है जो जौर ईजाद करते हैं
वसीम ख़ैराबादी
आसमानों पर भी हैं चर्चे हुस्न-ए-आलमगीर के
वसीम ख़ैराबादी
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
वसीम बरेलवी
वो पूछता था मिरी आँख भीगने का सबब
वसीम बरेलवी
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
वसीम बरेलवी