Couplets Poetry (page 34)

किस की ख़ुशबू ने भर दिया था उसे

वज़ीर आग़ा

खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी

वज़ीर आग़ा

ख़ुद अपने ग़म ही से की पहले दोस्ती हम ने

वज़ीर आग़ा

करना पड़ेगा अपने ही साए में अब क़याम

वज़ीर आग़ा

कैसे कहूँ कि मैं ने कहाँ का सफ़र किया

वज़ीर आग़ा

कहने को चंद गाम था ये अरसा-ए-हयात

वज़ीर आग़ा

जबीं-ए-संग पे लिक्खा मिरा फ़साना गया

वज़ीर आग़ा

इतना न पास आ कि तुझे ढूँडते फिरें

वज़ीर आग़ा

दिए बुझे तो हवा को किया गया बदनाम

वज़ीर आग़ा

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला

वज़ीर आग़ा

चलो अपनी भी जानिब अब चलें हम

वज़ीर आग़ा

बंद उस ने कर लिए थे घर के दरवाज़े अगर

वज़ीर आग़ा

अजब तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी हम ने

वज़ीर आग़ा

ऐसे बढ़े कि मंज़िलें रस्ते में बिछ गईं

वज़ीर आग़ा

अब तो आराम करें सोचती आँखें मेरी

वज़ीर आग़ा

आहिस्ता बात कर कि हवा तेज़ है बहुत

वज़ीर आग़ा

ज़ुलेख़ा के वक़ार-ए-इश्क़ को सहरा से क्या निस्बत

वासिफ़ देहलवी

ये तूफ़ान-ए-हवादिस और तलातुम बाद ओ बाराँ के

वासिफ़ देहलवी

ये महफ़िल आज ना-अहलों से जो मामूर है 'वासिफ़'

वासिफ़ देहलवी

वो जिन की लौ से हज़ारों चराग़ जलते थे

वासिफ़ देहलवी

वफ़ूर-ए-बे-ख़ुदी में रख दिया सर उन के क़दमों पर

वासिफ़ देहलवी

क़िस्मत की तीरगी की कहानी न पूछिए

वासिफ़ देहलवी

क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना

वासिफ़ देहलवी

पाँव ज़ख़्मी हुए और दूर है मंज़िल 'वासिफ़'

वासिफ़ देहलवी

नसीम-ए-सुब्ह यूँ ले कर तिरा पैग़ाम आती है

वासिफ़ देहलवी

क्या ग़म जो हसरतों के दिए बुझ गए तमाम

वासिफ़ देहलवी

कितनी घटाएँ आईं बरस कर गुज़र गईं

वासिफ़ देहलवी

किसी को याद कर के एक दिन ख़ल्वत में रोया था

वासिफ़ देहलवी

ख़ुदा के सामने जो सर यक़ीं के साथ झुक जाए

वासिफ़ देहलवी

जो रंग-ए-इश्क़ से फ़ारिग़ हो उस को दिल नहीं कहते

वासिफ़ देहलवी