Couplets Poetry (page 32)

साफ़ क़ुलक़ुल से सदा आती है आमीन आमीन

वज़ीर अली सबा लखनवी

रोज़ ओ शब फ़ुर्क़त-ए-जानाँ में बसर की हम ने

वज़ीर अली सबा लखनवी

क़ैद-ए-मज़हब वाक़ई इक रोग ही

वज़ीर अली सबा लखनवी

पाया है इस क़दर सुख़न-ए-सख़्त ने रिवाज

वज़ीर अली सबा लखनवी

नहीं है हाजियों को मय-कशी की कैफ़िय्यत

वज़ीर अली सबा लखनवी

न पढ़ा यार ने अहवाल-ए-शिकस्ता मेरा

वज़ीर अली सबा लखनवी

मेरे बग़ल में रह के मुझी को क्या ज़लील

वज़ीर अली सबा लखनवी

मेरे अशआ'र से मज़मून-ए-रुख़-ए-यार खुला

वज़ीर अली सबा लखनवी

मजनूँ नहीं कि एक ही लैला के हो रहें

वज़ीर अली सबा लखनवी

मय पी के ईद कीजिए गुज़रा मह-ए-सियाम

वज़ीर अली सबा लखनवी

मादूम हुए जाते हैं हम फ़िक्र के मारे

वज़ीर अली सबा लखनवी

क्या बनाया है बुतों ने मुझ को

वज़ीर अली सबा लखनवी

कुदूरत नहीं अपनी तब्-ए-रवाँ में

वज़ीर अली सबा लखनवी

ख़ुद-रफ़्तगी है चश्म-ए-हक़ीक़त जो वा हुई

वज़ीर अली सबा लखनवी

ख़ाक में मुझ को मिला के वो सनम कहता है

वज़ीर अली सबा लखनवी

कलेजा काँपता है देख कर इस सर्द-मेहरी को

वज़ीर अली सबा लखनवी

का'बे की सम्त सज्दा किया दिल को छोड़ कर

वज़ीर अली सबा लखनवी

काबा बनाइए कि कलीसा बनाइए

वज़ीर अली सबा लखनवी

जब उस बे-मेहर को ऐ जज़्ब-ए-दिल कुछ जोश आता है

वज़ीर अली सबा लखनवी

जब मैं रोता हूँ तो अल्लाह रे हँसना उन का

वज़ीर अली सबा लखनवी

इतनी तो दीद-ए-इश्क़ की तासीर देखिए

वज़ीर अली सबा लखनवी

इन की मिज़ा है काबा-ए-अबरू में मोतकिफ़

वज़ीर अली सबा लखनवी

हम रिंद-ए-परेशाँ हैं माह-ए-रमज़ाँ है

वज़ीर अली सबा लखनवी

हम भी ज़रूर कहते किसी काम के लिए

वज़ीर अली सबा लखनवी

हुआ धूप में भी न कम हुस्न-ए-यार

वज़ीर अली सबा लखनवी

हैं वो सूफ़ी जो कभी नाला-ए-नाक़ूस सुना

वज़ीर अली सबा लखनवी

फ़स्ल-ए-गुल ही ज़ाहिदों को ग़म ही मय-कश शाद हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

दोनों चश्मों से मरी अश्क बहा करते हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

दिलों में गब्र-ओ-मुसलमाँ ज़रा ख़याल करें

वज़ीर अली सबा लखनवी

दिल में इक दर्द उठा आँखों में आँसू भर आए

वज़ीर अली सबा लखनवी