Couplets Poetry (page 33)
देखिए आज वो तशरीफ़ कहाँ फ़रमाएँ
वज़ीर अली सबा लखनवी
दश्त-ए-जुनूँ में आ गईं आँखें जो उन की याद
वज़ीर अली सबा लखनवी
चश्म वा रह गई देखा जो तिलिस्मात-ए-जहाँ
वज़ीर अली सबा लखनवी
चार उंसुर के सब तमाशे हैं
वज़ीर अली सबा लखनवी
बोसा-ए-सब्ज़ा-ए-ख़त दे के गुनहगार किया
वज़ीर अली सबा लखनवी
बाक़ी रहा न फ़र्क़ ज़मीन आसमान में
वज़ीर अली सबा लखनवी
बात भी आप के आगे न ज़बाँ से निकली
वज़ीर अली सबा लखनवी
ऐ सबा क़िल'अ-ए-हस्ती से जो दम घबराया
वज़ीर अली सबा लखनवी
अहवाल-ए-मज़ाहिब से ये साबित हुआ हम को
वज़ीर अली सबा लखनवी
अब तो साहब की हुई ख़ातिर जम्अ'
वज़ीर अली सबा लखनवी
आशिक़ हैं हम को हर्फ़-ए-मोहब्बत से काम है
वज़ीर अली सबा लखनवी
आप को ग़ैर बहुत देखते हैं
वज़ीर अली सबा लखनवी
आप ही अपने ज़रा जौर-ओ-सितम को देखें
वज़ीर अली सबा लखनवी
आदम से बाग़-ए-ख़ुल्द छुटा हम से कू-ए-यार
वज़ीर अली सबा लखनवी
ये किस हिसाब से की तू ने रौशनी तक़्सीम
वज़ीर आग़ा
ये कैसी आँख थी जो रो पड़ी है
वज़ीर आग़ा
या रब तिरी रहमत का तलबगार है ये भी
वज़ीर आग़ा
या अब्र-ए-करम बन के बरस ख़ुश्क ज़मीं पर
वज़ीर आग़ा
वो ख़ुश-कलाम है ऐसा कि उस के पास हमें
वज़ीर आग़ा
वो अपनी उम्र को पहले पिरो लेता है डोरी में
वज़ीर आग़ा
उस की आवाज़ में थे सारे ख़द-ओ-ख़ाल उस के
वज़ीर आग़ा
उम्र भर उस ने बेवफ़ाई की
वज़ीर आग़ा
थी नींद मेरी मगर उस में ख़्वाब उस का था
वज़ीर आग़ा
समेटता रहा ख़ुद को मैं उम्र-भर लेकिन
वज़ीर आग़ा
सफ़र तवील सही हासिल-ए-सफ़र ये है
वज़ीर आग़ा
रेत पर छोड़ गया नक़्श हज़ारों अपने
वज़ीर आग़ा
क़िस्मत ही में रौशनी नहीं थी
वज़ीर आग़ा
पहना दे चाँदनी को क़बा अपने जिस्म की
वज़ीर आग़ा
मंज़र था राख और तबीअत उदास थी
वज़ीर आग़ा
लाज़िम कहाँ कि सारा जहाँ ख़ुश-लिबास हो
वज़ीर आग़ा