Couplets Poetry (page 429)

ऐ इंक़लाब-ए-नौ के उजाले कहाँ है तू

दिलकश सागरी

वस्ल की रात जो महबूब कहे गुड नाईट

दिलावर फ़िगार

स्टेज पर पड़ा था जो पर्दा वो उठ चुका

दिलावर फ़िगार

साहब ये चाहते हैं मैं हर हुक्म पर कहूँ

दिलावर फ़िगार

मुशाइरा में सुनूँ कैसे सुब्ह तक ग़ज़लें

दिलावर फ़िगार

मार खाने से मुझे आर नहीं है लेकिन

दिलावर फ़िगार

कहीं गोली लिखा है और कहीं मार

दिलावर फ़िगार

जो हल्दी से मोहब्बत है तो यारो

दिलावर फ़िगार

जाँ देने को पहुँचे थे सभी तेरी गली में

दिलावर फ़िगार

एक शादी तो ठीक है लेकिन

दिलावर फ़िगार

औरत को चाहिए कि अदालत का रुख़ करे

दिलावर फ़िगार

अदीब-ओ-शायर-ओ-फ़नकार बोते हैं जो शजर

दिलावर फ़िगार

अदब को जिंस-ए-बाज़ारी न करना

दिलावर फ़िगार

वही सितारा-नुमा इक चराग़ है 'आज़र'

दिलावर अली आज़र

उस से मिलना तो उसे ईद-मुबारक कहना

दिलावर अली आज़र

उस से कुछ ख़ास तअल्लुक़ भी नहीं है अपना

दिलावर अली आज़र

तुम ख़ुद ही दास्तान बदलते हो दफ़अतन

दिलावर अली आज़र

सुख़न-सराई कोई सहल काम थोड़ी है

दिलावर अली आज़र

सभी के हाथ में पत्थर थे 'आज़र'

दिलावर अली आज़र

मैं जब मैदान ख़ाली कर के आया

दिलावर अली आज़र

एक लम्हे के लिए तन्हा नहीं होने दिया

दिलावर अली आज़र

इक दिन जो यूँही पर्दा-ए-अफ़्लाक उठाया

दिलावर अली आज़र

चाँद तारे तो मिरे बस में नहीं हैं 'आज़र'

दिलावर अली आज़र

बदन को छोड़ ही जाना है रूह ने 'आज़र'

दिलावर अली आज़र

अब मुझ को एहतिमाम से कीजे सुपुर्द-ए-ख़ाक

दिलावर अली आज़र

ये भीगी रात ये ठंडा समाँ ये कैफ़-ए-बहार

दिल शाहजहाँपुरी

वक़्त-ए-रुख़्सत तसल्लियाँ दे कर

दिल शाहजहाँपुरी

शबाब ढलते ही आई पीरी मआ'ल पर अब नज़र हुई है

दिल शाहजहाँपुरी

मैं ग़र्क़ हो रहा था कि तूफ़ान-ए-इश्क़ ने

दिल शाहजहाँपुरी

मय-ए-कौसर का असर चश्म-ए-सियह-फ़ाम में है

दिल शाहजहाँपुरी